Wednesday, December 30, 2020

                                                 अजब दस्तूर था शहर में तेरे 



अजब दस्तूर देखा शहर  में तेरे

जो गुनाह था मेरे लिए , वो बस एक आम सी बात थी शहर  में तेरे|

वो जिन बातों को मैं गलत मानता रहा उम्मर भर

फ़िर पता चला की सब जायज़ था शहर  में तेरे|

मुझे तो बस इतना पता था की लफ्ज़ काफी होते हैं भरोसे के लिए

फ़िर इल्म हुआ की लफ्ज़ महज़ लफ्ज़ थे शहर में तेरे|

तेरी सादगी और सचाई देख कर तू कुछ अलग सा लगा था

अब एहसास हुआ की सब एक जैसे दिखते हैं लोग शहर  में तेरे|

इलाज तो ये है की हम कूच कर जाएँ

हमें कुछ समझ नही आता अब इस शहर  में तेरे||


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Monday, December 28, 2020

 

                      नाराज़गी खुद से


पता नहीं ये मेरी जिद है या छुपी हकीकत कोई

मैं लाख गुज़ार्शें करता हूँ, फ़िर भी खुद को मना नहं पाता|

एक बात तो पक्की है की मैं खुद से खफा हूँ

नाराज़गी इतनी है की मैं खुद से नज़रें मिला नहीं पाता|

आज खुद को तिराहे पे खड़ा पाता हूँ मैं

किस रास्ते को छोड़ना है किस पे चलना है, मैं खुद को समझा नहीं पाता|

है कुछ भी नहीं, सिवाय ख्यालूँ के मेरे

ये जानता हूँ फ़िर भी ये उलझन सुलझा नहीं पाता|

कहीं बार कुछ रास्ते  अपने घर को जाते दिखते हैं धूर से

फ़िर कोई आ कर बता जाता है की ये रास्ता तेरे घर तक नहीं जाता|


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लफ्ज़ और हकीकत


बड़ी आसानी से मोहब्बत का दावा कर गया कोई,

मैं चुप रहा, कुछ कह न पाया, मुस्कुरा कर दर-गुज़र कर आया|

लफ्ज़ों की खूबसूरती से मोहब्बत का क्या लेना देना,

लफ्ज़ हैं ये ज़रूरत -ओ- वक़्त के साथ बदल जाया करते हैं, लफ्ज़ों में क्या रखा है|

अब इन लफ्ज़ों को मैं दिमाग तक आने नहीं देता,

सुनता हूँ, सुन कर बोलने वाले को लौटा आता हूँ, सो मैं यही कर आया|

अब जैसे मोहब्बत किसी दूर पहाड़ में बसी किसी बस्ती सी लगती है,

जो दूर इतनी होती है कि जो भी उसकी तलाश में गया, खुद को ही भूल आया|

मोहब्बत तो किसी लफ्ज़, तस्वर, मुज़ाहिरे की मोहताज नहीं होती,

अगर हो तो हमेशा रहती है, बिना किसी डर, दावे, दिखावे या इज़हार के|

बाकी सब तो सिनेमा के किस्से हैं, देर तक जिंदा नहीं रहते,

किरदार बदलते हैं तो किस्से बदल जाया करते हैं, ये फैसला मैं खुद से करके, हाथ जोड़ माफ़ी मांग आया|

 

Saturday, December 26, 2020

                                              There are no Rights and Wrongs in love


And he says that there is nothing like wrong or right decisions in love, for it is above all the worldly norms, rules, regulation and traditions/cultures as well. All the decisions taken in love are always right. True love and friendship are above all rights and wrongs, if you think that there are rights and wrongs in love and your decisions are influenced by others who have nothing or very little to do with your life, believe me you was never there in the beautiful state of mind-the unconditional love. Sometimes, we adopt the copied behavior, use filmy phrases, show mimicked care and affection and then it all ends at some point of time. We take bad decisions and accept what others ask us to accept to falsely prove that we are always right. Sometimes when we sit and think with stable mind, the inner voice tells us that perhaps we did wrong, but we convince ourselves falsely and keep compromising with the life.

He also says that in true love and friendship there is no “thanks and sorry” because there exist understandings, tolerance and acceptance of each-other’s misdeeds and mistakes. But we do it all the time in our relationships as people say sorry and thanks make our relationships strong, but they create difference and rifts.

I always talk, argue and search for him (the one who say all this). He resides there inside me, always guides me in right directions and perhaps he is right, perhaps he understands the true love and friendship.



Thursday, December 24, 2020

                                          बोझ

 

न रंज-ओ-ग़म , न कोई एहसास बा-ज़ाहिर होने देता हूँ

ये देख कर साथी आजकल अक्सर हैरान रहते हैं|

बड़े से बड़े दुख को एक हंसी में उड़ा आना

झूठ ही सही पर इससे हुनर-ऐ-इंसान कहते हैं|

बहुत अच्छा है कुछ बातों को मज़ाक मान कर दर-गुज़र कर आना

जितना भूलता हूँ उतना बोझ कम होता चला जाता है-

बड़ी काम की दुआ है जिससे मंद मुस्कान कहते हैं|

कभी चुप रहना, कभी खुल के बोल जाना

हम भी दुनियाँ के इम्तेहान में हरदिन कुछ अच्छा-बुरा सीख आते हैं|

न कोई उम्मीद, न बातों पे लोगों की कोई शक न भरोसा

लफ्ज़ हैं सुनता हूँ, सुनकर उन्हें कहीं खाली जगह फ़ेंक आता हूँ|

कोशिश तो ये है की हर दिन कुछ न कुछ पानी में बहा आया करू

बहुत भरा भरा है घर मेरा, कुछ चीज़ें न चाहते हुए भी फ़ेंक आता हूँ||


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                                          खुद से बातें 


बैठ कर रोने का मन तो मेरा भी है, होता भी  है,

बहुत सारी आँखों से आँसू  पोछने  होते हैं, मैं भला रोऊ कैसे?

दिल तो चाहता है छोड़ दुनियाँ कहीं दूर  चला जाऊ कुछ दिन,

बहुत चेहरों की वाहिद मुस्कान हूँ मैं, मैं कहीं जाऊं कैसे?

मैं हफ्तों चुप रह सकता हूँ, घने जंगल की ख़ामोशी की तरह,

मेरी आवाज़ सुन कर मुस्कान आती है कितनों के चेहरों पर, मैं चुप रहूँ  कैसे?

कभी अगर मायूस होता भी हूँ तो अपने  आप सवाल करने लगते  है,

तुझे चलना है  निरंतर, तुझे रुकना नहीं है, बताओ मैं इधर-उधर जाऊ कैसे?

मेरी हंसी झूठी  सही, किसी के काम तो आती है,

मैं हँसते-मुस्कराते फूलों के सामने आपना रंज-ओ-ग़म दिखाऊ  कैसे?

एक ज़िन्दगी से लड़ाई, खुद से करता हूँ मैं सौ-सौ  तकरार,

फ़िर हर तरफ ज़िम्मेदारियाँ हज़ार, मैं भला सो जाऊं  कैसे?


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Wednesday, December 2, 2020

 

A realization/एक एहसास

 

सारी दुनियाँ अक्सर दो चीजों के पीछे रहती है , “खूबसूरती और चैन” दोनों बहुत ही नायाब हैं, हर किसी को मिलते नहीं, इंसान इसकी तलाश में क्या क्या नहीं करता, कभी खुद को खूबसूरत बनाने के हज़ार नुस्खे अपनाता है और कभी चैन पाने के लिए महबूब और मुहब्बत की तलाश में रहता है, चाँद तारों से तुलना करता है और नजाने क्या क्या करता है| मगर खूबसूरती और चैन तो कहीं मिलता नहीं, अगर कहीं थोडा बहुत एहसास होता है तो वो वक्ती या कुछ पल का होता है, वक़्त के साथ साथ बाहरी  खूबसूरती तो बदल जाया करती है| असल में इंसान के अन्दर जो चीज़ है उसको बाहर डूंडता फिरता है वो, अमन, चैन और सुन्दरता तो इंसान के अन्दर होती है बस वो उसे देख नही पाता| ज़रूरी नहीं की महबूब हो तो  तभी मुहब्बत होती है, वो तो बस एक जरिया है आपके अन्दर छुपी हुई मुहब्बत को जगाने का|

आज सुबह पहाड़ में सफ़र करने का मौक़ा मिला, थोड़ी देर सोया और फिर जाग गया, आँखें खुलते ही एक अजब सा नज़ारा देखा, ठंडी ठंडी हवा, रात की वो खूबसूरत चुपी, झील में ठहरा हुआ वो पानी और उसकी शांति, चाँद की फूटती रौशनी मद्धम-मद्धम सी जैसे सोयी हुई बस्ती को बेदार हो जाने की दावत देती हो, गाड़ी  में सब कुछ भूल कर एक दुसरे के कंधे पर सर रख सोते हुए लोग, उतराई और चढाई में गाडी की बदलती आवाजें, दूर  कहीं गाँव में जलते बिजली के बल्ब जैसे आसमान में सितारे और चादर ओढ़ के खिड़की से बाहर देखता और  मुस्कराता मै| यू मानिये जैसे आज ही जन्म  हुआ हो मेरा, जैसे सबकुछ नया नया हो और मेरे लिए ही हो, ना अतीत ना मुस्तकबिल, ना आगाज़, ना अंजाम, कुछ भी याद ना था मुझे, बस देखे जा रहा था और मुस्कराए जा रहा था, एकांत में, वर्तमान में, बिना किसी से कुछ चाहे हुए, बिना किसी को परखे हुए, बिना किसी से नाता-रिश्ता बनाये हुए| जैसे मेरे अन्दर एक शांत समुन्दर हो एकदम थमा हुआ, और मैं  अपने ही अन्दर की आवाज़ सुन पा रहा था, ये शान्ति, ये पूर्णता का एहसास, ये ख़ामोशी हम सब के अन्दर है, मगर हम अक्सर दूसरों के अन्दर ढूँढ़ते हैं और खुद को भूल जाते हैं| काश हम हर दिन यूं ही जी पायें!

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                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...