Tuesday, May 19, 2020


                                                       
                                                         आज़ाद ???


यहाँ मुकामिल आज़ाद नहीं मिलता कोई
हर कोई किसी न किसी का पुजारी है|

यहाँ मिलता नहीं कोई फर्द(व्यक्ति) खाली
हर किसी को कोई न कोई ठेकेदारी है|

कोई बना बेठा है हुकमरान, कोई मालिक जहां का
लाख़ों-करोड़ों हैं जो महरूम हैं बुनियादी हक़ से, जिनकी ज़िन्दगी तक यहाँ उधारी है|

हर कोई लगा है नकली पेहचानों को बनाने और बचाने मैं
इस दौड़ में वो भूल चूका है जो उसकी असल जिम्मेदारी  है|

नफरत इतनी सस्ती हो गयी है की हर दूकान में मुफ्त बिकने लगी है
अकाल सा पड़ गया है जैसे मोहब्बत का और अगर कहीं है भी तो वक़ती है या उधारी है|

हर कोई मज़हब, ज़ात पूछता-बताता फिरता है
बटे हुए हैं हम “हम” और “उन में” हर चीज़ में “हमारी” –“तुम्हारी” है|

सोचता हूँ की हम ने क्यूँ बाँट कर इस से टुकडों में “जहनुम” बना दिया है
ये जो जन्नत सी खूबसूरत धरती हमारी है|

आज़ाद हो जाऊं इस जाल से जल्द, हर हाल इस कोशिश में रहता हूँ 
ये जो बेबुनियाद कानून हैं, बंदिशें हैं, ये जो उलझन भरी ज़िन्दगी हमारी है|

यहाँ मुकामिल आज़ाद नहीं मिलता कोई
हर कोई किसी ना किसी का पुजारी है|

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Thursday, May 14, 2020





वो उनका वादा कर के भूल जाना और मेरा देर तक बस उम्मीदें लगाये इंतज़ार मैं बेठे रहना,
बड़ा आम सा हो गया है ये किस्सा,अब तो जैसे आदत सी हो गयी है|


ये दिल की  धड़कन जो कभी तेज़ रफ्तारी में रहती थी, वो जो सनसनी दिल-ओ-दिमाग में रहती थी,
अब तस्सली तो देखो, सनसनी भी नहीं और धड़कन की रफ़्तार अब मधम सी हो गयी है|


इतना  मुश्किल हो गया है पहुंचना उन तक के सदायें तक नहीं आती -जाती,
गोया उन से मिलना या उनको सुन पाना, ईद चाँद की ज़यारत सी हो गयी है|


देख कर ये सब, में थोड़ा ग़मगीन तो हो जाता हूँ, हाँ मगर उनकी भी होंगी मसरूफियाँ काफी,
वो उनकी जुस्तजू मैं मुन्तजिर रहना, वो आस लगाये रखना, ये इंतज़ार न हो कर -इबादत सी हो गयी है|


ये बे-बस्सी है न सीना ज़ोरी कोई, बस एक मुसलसिल आदत सी है,
तुझ से एह ज़िन्दगी एक नादान शरारत सी हो गयी है|


उम्मीद है के कभी तो एहसास हो उनको, कभी तो वो वादा निभाएं, कभी तो इबादत रंग लाये,
नही तो लगता है मेरी ज़िन्दगी को शायद मुझसे ही कोई शिकायत सी हो गयी है|


यूं  तो सबर व तसल्ली खुद के लिए बहुत है, मगर इंतज़ार तो फिर भी रहता ही है,
एह वक़्त ये खुशी अब तेरी इनायत सी हो गयी है|


वो उनका वादा कर के भूल जाना और मेरा देर तक बस उम्मीदैं लगाये इंतज़ार मैं बेठे रहना,
बड़ा आम सा हो गया है ये किस्सा,अब तो जैसे आदत सी हो गयी है|


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Tuesday, May 12, 2020


                              कुछ सवाल खुद से भी !!





“मुसलमान, मोहम्मडन, मुस्लिम, इस्लाम” जब भी हम ये लफ्ज़ पढ़ते  हैं, बोलते हैं या सुनते हैं तो  हमारे दिमाग में अलग-अलग तस्वीर बनती है, इस तस्वीर का बनना इस बात पर बहुत निर्भर करता है कि हम, इन लफ्ज़ों से जुडी कितनी और किन-किन चीज़ों को जानते हैं| किसी के मन में  ये लफ्ज़ सुन कर एक ऐसे इन्सान की तस्वीर बनती है जो उसकी नज़र में इन्सान है ही नहीं, किसी के मन में एक लम्बी दाढ़ी वाले और सर पर  टोपी वाले, सलवार कमीज़ पहने हुए , या नक़ाब से सर ढके  हुए  इन्सान की तस्वीर बनती है| कोई इन लफ्ज़ों का जुडाव किसी  कबाड़ उठाने वाले, सब्जी बेचने वाले, मांस बेचने वाले, हजाम की दुकान वाले, रिक्शा  चलाने  वाले या बाकि  छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों  से करते हैं| कोई इन्हें पाकिस्तान के समर्थक या पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के समर्थक के रूप  में जानता है, कोई इनका नाम आतंकवाद  से जोड़ के देखता है तो कोई जिहादी के नाम से जानता  है, कोई औरंगजेब और गज़नवी से जोड़ के देखता है, वहीँ एक छोटा सा तबका वो भी है जो थोड़ी अलग राय रखता है वो इन लफ्ज़ों को सुन कर कुछ जाने माने लोग जैसे अब्दुल कलाम, अबू अल कलाम आज़ाद, बिस्मिल्लाह खान, शारुख खान, सलमान खान आदि  का तस्सवर  करता है| अगर कोई ज्यादा ही समझदार हो तो वो कुछ अतिरिक्त  जानकारी भी रखता है|

लेकिन सब से मशहूर है टीवी पर दिखाया गया मुसलमान, एक अलग ही तस्वीर दिखाती  है हमारी ‘टीवी’ , और धीरे-धीरे ये तस्वीर हम सब के दिमाग में भी बैठ  जाती है और हमें भी हर इन्सान में वही टीवी वाला मुसलमान दिखाई देने लगता है| जिस के नाम से लोग डरते हैं गोया वो उनका दुश्मन ‘मुसलमान बन कर धरती पर आया है| ये चर्चा सुनने को आम मिल जाती  है कि “ये लोग” कभी हमारे नहीं हो सकते, वफ़ादार नहीं हो सकते, भरोसा करने लायक नहीं हो सकते और भी बहुत कुछ| मगर एक सवाल ये भी है के टीवी तो कुछ साल पहले ही आई, फिर ये सब इतना जल्दी कैसे हो गया? अगर हम सोचने लगें तो असल में इसकी जड़ें बहुत गहरी  हैं| ये जो तस्वीर आज हम सब देखते हैं इस के बनने में  हज़ारों साल लगे हैं| सातवीं सदी में जब इस्लाम का जन्म हुआ तब उसके सामने दो मज़हब और थे -ईसाइयत  और यहूदियत, ये मज़हब की लड़ाई जो आज हर जगह देखने को मिलती है इस की शरुआत वहाँ से हुई| लड़ने का सीधा सा नीयम है लड़ाई  में या तो कोई दुश्मन पैदा कर लो या दुश्मन बना लो क्यूंकि  बिना दुश्मन लड़ाई तो लड़ी नहीं जा सकती| किसी भी विचारधारा को पनपने के लिए संख्या चाहिए, इस लिए सब की नज़र संख्या पर ही होती है| इस सातवीं सदी की लड़ाई ने दुनियाँ को एक नया शब्द दिया “जिहाद” जिस से दुनियाँ की सब से बड़ी कुर्बानी कहा जाने लगा, किसको पता था हज़ारों साल बाद ये विचार दुनियाँ को बर्बाद करने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा| हर एक विचारधरा और उसको मानने वालों की एक अपनी अलग सी पहचान हुआ करती है जो उनके लिए सब कुछ होती है| अब इस पहचान को  बचाना और फैलाना  उनके लिए सबसे बड़ा काम होता है, कुछ यूं ही हुआ भी | धीरे-धीरे इस्लाम पूरी दुनियाँ में फेलने लगा, क्यूंकि  अरब व्यापार के सिलसिले में दुनियाँ के अलग अलग कोनों में फेले थे, इस दौरान वो अपने साथ इस्लाम भी ले आए|

तारीख़ बताती है कि भारत में इस्लाम आठवीं या नवि सदी में पहुंचा, क्यूंकि उस वक़्त अरब ताजिर समुन्दर के रास्ते से आते थे इसलिए ये दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों  तक ही महदूद रहा| उत्तर भारत में इस्लाम बारहवीं  सदी में पहुंचा| ये विचारधारा यहाँ भारत में फैलाई गयी, वक़्त के साथ यहाँ के लोग इस्लाम अपनाने लगे, संख्या बढ़ने  लगी, इसी बीच मध्यपूर्वी  एशिया से शासक यहाँ आने लगे, बाद में वो दिल्ली  सल्तनत के नाम से जाने गए| इन शासकों  ने  भारत के एक बड़े हिस्से पर सदियों  तक राज किया, बाद में मुग़ल भारत आए और उन्होंने ने भी देश के एक बड़े भू-भाग पर कई पीढ़ियों तक शासन किया | इस बीच धर्म  उनका सबसे बड़ा हथियार रहा क्यूंकि  ये लोगों को तोड़ने और जोड़ने के काम आया करता था, तारीख़ बताती है कि किस क़दर अत्याचार हुए, लोगों का ज़बरदस्ती धर्म  परिवर्तन हुआ, मज़हबी इदारे तोड़े गए और भी बहुत कुछ हुआ| इस सब का एक बड़ा मकसद तब भी सत्ता था और आज की दुनियाँ में बस  सत्ता है, लेकिन नुक्सान तब भी आम इन्सान का हुआ और आज  भी उसी का हो रहा है| अगर मज़हबी फूट के इतिहास  में अंग्रेजों का ज़िकर न आए तो नाइंसाफी होगी| अंग्रेजों  ने भारत की संस्कृति का अध्यन  कर एक नया तोड़ निकला जिसे आज हम “फूट डालो और राज करो” के नाम से जानते हैं| जब सब लोग एकजुट होकर आज़ादी  की लड़ाई लड़ने लगे, तब उनके पास कोई और चारा न था तो मज़हब के नाम पर बाँट दिया| इतिहास में खून खराबे और हिंसा की बे-शुमार कहानियाँ  हैं, परन्तु विभाजन ने इस पूरी तस्वीर को एक नया रंग दे दिया, ‘मज़हबी रंग’| लाख़ों की संख्या में लोग मारे गए, बे-घर हो गए और कुछ तो आज भी खराब हालत में हैं| इस सब के पीछे एक चीज़ थी धर्म  और दूसरी सत्ता की भूख, लेकिन यहाँ भी कीमत उन्हीं गरीब आम लोगों को चुकानी पड़ी जिनका धर्म  से कुछ ख़ास लेना देना नहीं था, बस बलि  के बकरे बन गए|
विभाजन ने इन बढ़ती हुई दूरियों को एक गहरी खाई का रूप दे दिया, और कुछ लोगों ने अपने फायदे क लिए इन् खाइयों को और गहरा कर दिया| विभाजन ने हम को दो टुकडों में बाँटने के साथ-साथ लड़ने के लिए दुश्मन भी दे दिए  और ये आपसी दुश्मनी का सिलसिला शरू हो गया. फिर कश्मीर के नाम पर  एक बार फिर सातवीं-आठवीं सदी का ‘कांसेप्ट’ “जिहाद” जिंदा हुआ| इस जिहाद ने आतंकवाद  को जन्म दिया लेकिन यहाँ भी सत्ता किसी  ने संभाली  और कीमत किसी और ने चुकाई| बड़ी-बड़ी संस्थाएं बन गयी और उनमें नौजवान लडकों को शामिल किया जाने लगा जो एक काल्पनिक जन्नत  और दुनियाँ की खातिर एक दिखाए ख्वाब के लिए लड़ने लगे और मरने व मारने लगे| कारण था ग़रीबी, जहालत और इसका फ़ायदा उठाया कुछ धर्म  के ठेकेदारों ने, जो उन्हें कभी न पूरा होने वाला ख़्वाब दिखा कर बेगुनाह लोगों को मार कर अपनी रोटियाँ सेकते गए| इस सब से  दुनियाँ के सामने मुस्लमान की एक तस्वीर बनाई और उसके साथ डर जुड़ गया, वो डर जो धीरे धीरे नफरत में बदल गया और ऐसी नफरत के जिसकी कोई हद ही नहीं रही|

1947 का बटवारा मानव इतिहास  का एक बहुत बड़ा कोहराम था, जिसमें लाखों की संख्या में बेगुनाह लोग बेबुनियाद नफ़रत की वजह से अपनी जान गवा बैठे| उन में ज्यादा तर लोग तो वो थे जिन्हें आजादी के दिन ही मालूम हुआ कि मुल्क का बटवारा हो गया है, वो वतन जहाँ वो सालों से रह रहे थे, बिना कुछ सोचे समझे छोड़ना पड़ा| नफ़रत, आशंकाओं और  खोफ ने सब कुछ भुला दिया, बिना किसी  मंजिल के वो चल दिए वीरान राहों पर और फिर बरसों तक ज़िल्लत  की ज़िन्दगी जीनी पड़ी| बटवारे के किस्से सुन कर आज भी दिल देहल जाता है, और सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि, किस क़दर इन्सान वहशी  होगया था और बदले की आग में, बहकावे  में आ कर उस ने खून की नदियाँ बहा दी| इत्तेफ़ाक तो ये था कि जिन लोगों की वजह से बटवारा हुआ वो आराम से जहाज़ या स्पेशल ट्रेन से गये और जिनके नाम पर बटवारा हुआ वो गाजर-मुली की तरह कटते गए, कुछ ने डर के मारे आत्महत्या कर ली, कुछ ने धर्म  परिवर्तन कर लिए और न जाने क्या क्या हुआ|

इस घटना से सबक सीख कर बजाये कुछ ऐसा करने के फिर ये हालात या ख्याल पैदा न हों, हम ने एक दुसरे को अल्पसंख्यक  और बहुसंख्यक कह कर बाँटना शरू कर दिया| फिर कुछ नेता चुन लिए गये जो उनकी बात करते, अपनी-अपनी पहचाने  बनायीं और उनको बचाए रखने के लिए कई  मंसूबे बनाये गये| जान बूझ  कर एक तबके को तालीम से महरूम रखा गया, और जिनको थोड़ी बहुत तालीम मिली भी, तो उसके तय  करने वाले कोई और थे| धार्मिक शिक्षा पर जोर दिया गया और धार्मिक विचारधारा को बढ़ावा दिया गया| असल में वो धर्म  के नाम पर एक जैसी सोच के लोग पैदा करने की चाल थी जो वक़्त आने पर बिना सवाल किये हुक्म बजा सकें| लोगों को जान भुझ  कर बुनियादी ज़रूरतों से महरूम रखा गया ताकि वे  जीवन भर इन्ही मुदू में उलझे रहें और खुद के बारे में कभी सोच ही न पायें और सवाल करने का वक़्त न मिल पाए| वक़्त के साथ साथ ज़रूरत पड़ने पर इन्हीं आम लोगों का इस्तेमाल अलग-अलग मकसदों से किया गया| कभी किसी दंगे में किसी अमीर का बेटा, या किसी अला दर्जे के अफसर या नेता का बेटा शिकार नहीं बनता, अक्सर बलि का बकरा गरीब ही बनते हैं| वो लड़ते हैं जिन्हें धर्म  या पहचान से कुछ खास लेना देना नहीं है, लेकिन डर या पागलपन सब करने पर  मजबूर करता है| फ़ायदा  कोई और ले जाता है और फना कोई और हो जाता है, लड़ाई कोई भी हो कीमत वो ही चुकाते हैं जिन्हें लड़ाई से कोई ख़ास मतलब नहीं रहता|

मुस्लमान भी इस सब का शिकार हुए, उनको शिक्षा से दूर रखा गया और अगर दी भी तो बस धार्मिक शिक्षा जो धार्मिक कम और अधार्मिक ज्यादा बनाती चली गयी, सोचने और समझने की क्षमता ख़तम करती चली गयी, अगर कुछ सवाल उठे भी तो उनके जवाब किसी और ने दिए| एक काल्पनिक दुनियाँ का सपना दिखा कर, नर्क के मंज़र से डरा कर वो सवाल शांत कर दिए गये| उनको जान बूझ  कर बुनियादी ज़रूरतों और अधिकारों से वंचित रखा गया लेकिन एक पहचान ज़रूर दे दी गयी| एक छोटा सा तबका  पढ  लिख कर आगे निकल गया तो उन्होंने  भी वक़्त-फ-वक़्त पिछड़ो का इस्तेमाल ही किया| मैं  बहुत सारी धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक गुरुओं  को इस सब का ज़िम्मेदार  मानता हूँ| धर्म  के नाम पर कई औलादें  पैदा करना हो या बच्चों  को मदरसों में  तालीम दिलाना दोनों ने इस कौम को पीछे धकेल दिया| नतीजा ये हुआ कि संख्या बढ़ने से गरीब और गरीब हो गये और एक तरीके की शिक्षा ने कट्टरपंथी  विचारों को जगह दे दी| शरियत के नाम पर कई  सारी गलत चीज़ें चलती रहीं(तीन तलाक, बहुविवाह , पर्दा, नाबालिक लड़कियों की  शादी, लडकियों को शिक्षा न देना आदि)| धीरे-धीरे गरीबी, जहालत, कट्टरपंथी, अन्ध्भाक्ती, बदलाव विरोध, एक अलग सी पहचान  जैसी बीमारियाँ इस कौम में  आ गयी| हालांके कुछ लोग बहुत अच्छे  भी थे मगर उनकी संख्या बहुत कम रही और वो या तो चुप रहे या सेफ़ जोन में  चले गये|

गरीबी के कारण वो बच्चों  को शिक्षा नहीं दे पाए इसलिए रोज़ी रोटी की खातिर बचपन में  ही बच्चों  ने कई  सारी बुरी आदतें इख्तेयार कर  ली| बड़े हो कर वो या तो छोटी-मोटी  सेवाओं में  लग गये या मज़दूरी कर के गुज़ारा  करने लगे| गरीबी का फ़ायदा  उठा कर इन्ही  बच्चों  को कहीं तालिबानी बना दिया गया, कहीं मुजाहिदीन  बना दिया गया, कहीं ड्रग्स या हथियारों की तस्करी  में  लगा दिया गया| पाकिस्तान से आए एक  आतंकी अजमल कसाब की कहानी इन सब पहलुओं  पर रौशनी डालती है कि, कैसे मजबूरी का फ़ायदा   उठा कर, सपने दिखा कर कुछ लोग उनसे बेगुनाह लोगों को ख़तम करवाते हैं| कश्मीर हो, पाकिस्तान हो ,  अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया हो या नाइजीरिया, कहानी हर जगह  तकरीबन एक जैसी ही है| वो मज़हब जिस का फ़लसफ़ा ये बताता है कि अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, हमदर्दी, इमदाद, अच्छा बर्ताव, सब का आदर करना, सबको  उनका  हक दिलाना, किसी चींटी जैसे जानवर तक को न मसलना, फूलों की पंखुड़ियों तक को पैरों से न मसलना, मॉम से ज्यादा नरम रहना, वाघेरा वाघेरा| उस धर्म  को चंद ठेकेदारों ने अपने फ़ायदे की खातिर इस क़दर बदल दिया है कि आज इस धर्म  के मानने वालों को खुद से ही डर लगता है|

कश्मीर की वो घाटी जहाँ सूफी प्रथा का चलन था, जहाँ धर्म  के नाम से  किसी इन्सान की पहचान नहीं थी, जहाँ बुद्ध , हिन्दू, सिख  इस क़दर घुल मिल कर रहते थे गोया एक ही बाघ के फूल अलग हो कर भी साथ रहते हों,  और चमन की खूबसूरती बढ़ते हों| त्यौहार हो  या शादी  पता ही नहीं चलता था की किसका त्यौहार है, सब मिल कर झूमते गाते थे, खुशियाँ मनाते थे, पंडित जिन्होंने  पूरे  कश्मीर में  इल्म की शमा रोशन की, सब को पढ़ना लिखना सिखाया आखिर अपना घर छोड़ने पर मजबूर हुए और आज भी कश्मीर उनकी आँखों में  बसता है|

ये सब चंद लोगों की चाल है जिन्हें दूसरों की जान की परवाह नहीं, अपना लाभ  देखना है| उन्हें किसी की परवाह नहीं बस सत्ता चाहिए, आराम चाहिए| अगर कुछ करना है, अगर खुद भी ख़ुशी से जीना है और दूसरों को भी ख़ुशी से जीने देना है, अगर इज्ज़त से जीना है, अगर इस दुनियाँ को एक खूबसूरत और पुर-अमन जगह बनाना है तो हम सब को मिल कर सोचना होगा, जो जहालत के अँधेरे में  हैं उन्हें इल्म की रौशनी से रौश्नास कराना होगा, उनको गरीबी से ऊपर लाना होगा, उन्हें बदलाव का हिस्सा बनाना होगा, उन्हें सपना न दिखाकर हकीकत से रोबरू कराना होगा, उन्हें गलतियों  का एहसास दिलाना  होगा, ज़रूरत पड़ने पर सज़ा दिलानी  होगी  ताकि  वे  फिर कभी गलत न करे, उससे जीना सिखाना होगा, इन धार्मिक व्याख्याओं  को भूल कर असल धर्म  को अपनाना होगा| ये किसी एक इन्सान या किसी एक समूह  का काम नहीं हम सब को हाथ बटाना होगा|

ये जो सड़क पर  खड़ा मुसलमान  हम देखते हैं, ये जो टीवी का बताया मुसलमान  हम देखते हैं वो असल में  ऐसा है नहीं, बस बना दिया गया है, उसे तो ये भी नहीं पता वो ऐसा क्यूँ है? बस किसी ने बना दिया तो बन गया| असल में  उस बदनाम चेहरे के पीछे एक बेबस और लाचार इन्सान खड़ा है, जिसे धर्म  से कुछ लेना देना नहीं है उसे बस दो वक़्त की रोटी बहुत है, लेकिन ये टोपी, दाढ़ी और खुले खुले कपडे भी एक मजबूरी है, उसे यही बताया गया है, उसकी दुनिया शायद यही है, वो न इधर का है न उधर का| स्कूल से पहले और स्कूल के बाद एक बच्ची  अपने बाप की मदद करने उसकी ठेली पर आती है, उसकी सहायता करती  है, चंद रूपए बन जाएँ और वो रात को खाना खा लें ये उनका सब से बढ़ा धर्म  है बाकी तो बस कही-सुनी बातें हैं,बातों का क्या| उस बच्ची  का सपना किसी को मारना  या नुकसान पहुँचाना हरगिज़  नहीं है, उसे  पड़ लिख कर कुछ ऐसा करना है  कि वो अपने बाप को खुश रख सके-ये उसके लिए उसका धर्म  है| उन्हें हमारी नफरत नहीं बस थोड़ा सा प्यार  चाहिए, दाढ़ी और टोपी देख कर नफरत करने से पहले एक बार देख तो लें कि वो क्यूँ है और क्या है और हमें उससे क्या खतरा है?

इस्लाम का नाम सुनते ही हमारे अन्दर एक नफरत सी पैदा हो जाती है, एक गलत और भयानक सी तस्वीर बन जाती है, असल में  ये इस्लाम ऐसा है नहीं, ऐसा दिखाया गया है, निजि फायदे  के लिए इसे बदल दिया गया है| ये भी बाक़ी धर्मों  की तरह एक तरीका है जीवन जीने का, ठीक जैसे बाकी धर्म  हैं, इसमें  कमियाँ हैं और खूबियाँ भी, इसमें  सवाल की गुंजाईश है और न मानने की इजाज़त भी, मगर, हमारे चश्मे बदल दिए हैं इसके समर्थको ने भी और विरोधियों ने भी, जैसा कि हर धर्म  के साथ हुआ है| धर्म,धर्म  न रह कर बस नफ़रत का ज़रिया बन गया है, एक प्रथा, एक पहचान मात्र बन गया है| जिसका मकसद था लोगों को सही रास्ता दिखाना, सोचना सिखाना, जीना सिखाना, वाही आज भटका रहा है, मरवा रहा है| धरम तो एक रास्ता है एक मुकाम तक पहुँचने का, हम ने इसे महज़ एक हथियार बना लिया है, खुद को रंगों में  लपेट कर बाँट दिया है, हम बस प्रचारक बन गये हैं असली मकसद तो बहुत पीछे छूट गया है| जहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं, संख्या की लड़ाई नहीं, पहचान की होड़  नही, मारा-मारी नहीं, भेद-भाव नहीं, नफ़रत नहीं, लालच नहीं, धर्म  तो वही है बाकी तो बस अधर्म है, दिखावा है और कुछ नहीं|


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Sunday, May 10, 2020





                               Mothers these days!!




It is not possible to define or express the greatness of "the mother" and the beauty and holiness of her relationship, as it is beyond the limits of words and languages known. But there is nothing more pious and sacred as well as respectful than “mother”. Her relationship, her concerns and cares are priceless and indebted, they are selfless in nature, there is no start or end in her relationship, there are very less expectations and if there are, most probably they are for welfare and goodness of us (children). There are no likes and dislikes, she accepts you-what you are, she accepts you with your limitations and incapabilities  and helps you in overcoming those, she never let you go or abandon in bad or good times of yours. For you are an inseparable part of her existence/being. Relationship of a mother is incomparable, non-conditional, beyond the limits of time and space, worldly attachments and materials, likes and dislikes and wants etc. Her love is eternal and remain always there for you whether you respect her or look after her or not, weather you remember her or not, you always remain priority for her, she live more for you than her, for there is no self for her, she could not see you in isolation from herself that is why your every problem is her problem.
What ever we do, we cannot give back to mothers what they have given us, not even a little bit of her love can be given back, therefore perhaps she does not keep expectations from us.
What we do with her is not worth sharing and is shameful. We do not have few minutes for her, our meetings and works are more important for us, when we start our own families, she becomes a burden for us, now worldly love has replaced her true eternal love. Most of us abandon them on the advices and suggestions of our dear ones and send them to vridha-ashrams where they die in the hope that someday, we will come to see them, we do not spare some time for their last rites. If she lives with us, she is on the mercy of our so-called new family members, her suggestions and advices become valueless and insane, her love becomes become nothing for us. She looks after us and did everything for us all through her life now she is taking care of our children. Though she is not getting respect and dignified treatment still she has immense love for us and our family, she always prays for our wellness and prosperity. She does whatever she can through out her life but what about her? She also has some rights, at least a respectful and dignified life and treatment. We remember our mothers whenever we are in any problem (oye maan) because we are well sure that she can understand and feel our pain and problems but what we do for her when she is in problem? She remembers us every now and then, before eating, before sleeping and getting up, when she saw a person like us etc., but we remember her only for our selfish purposes when we are in problems or on some special occasions like festivals. If you are travelling somewhere she is the one who will be most worried about you, when you are returning from somewhere others will wait for the material you bring along with you but she will always waits for you, for you are everything for her, above all the properties and materials of the world.
One can find them sitting helpless, alone, outside the hospitals, on bustands, outside ration shops and many other such places and utilities. Struggling to live the remaining days of their lives. the best thing is even in these conditions they say nothing bad about you, this reflects their greatness and holiness. We cannot give them a little what they had given us.

We applaud and celebrate the mother day but very rarely introspect and try to know the reality. Very early we should realize the value of them and try to do what we can do for them, I find no service better than serving her, for me her service is above all worships ,for if she will be happy the whole universe will be open for me. She is like everything and above everything for us, we can fight, we can play, we can share anything with her. Other relationships and engagement are necessary but she is above all. Our world journey start and end with her.
As there is no “other” for mothers, she sees everyone just like her own dear ones without distinctions and differences. We all should also see all mothers as our own mothers, respect them, help them and do whatever we can to keep them happy, wherever we will be living.

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Wednesday, May 6, 2020

                                                                      सरहदें



मैं  अभी तक खुद को मुतमईन नहीं कर पाया कि ये दुनियां-जहाँ  किसने बनाया है| अभी तक के ज्ञान, खोज व जांच पड़ताल के अनुसार कई  विचारधाराएँ  हैं, दुनियाँ के बनने और बनाने के बारे मैं, लेकिन कोई भी पूरे तरीके से इस सवाल का जवाब नहीं ढूड पाया, हाँ मगर कुछ का कहना है कि ये पूरा जहाँ कुछ दिन में  बना, कुछ कहते हैं के इस के बनने मैं हफ्ते लगे| एक सोच ये है के इस के बनने में  लाख़ों साल का वक़्त लगा और आज  भी वो प्रक्रिया चल रही है| पूरे जहाँ का अंदाज़ा लगाना भी शायद अभी काफी मुश्किल से मुमकिन हो पाया है तो इस के बनने या बनाने वाले का पता लगाना इतना आसान काम नहीं है| लेकिन कोशिश आये  दिन कुछ न कुछ नया  सामने ज़रूर लाती रहती है| बहुत लोग इस बात को रहस्य  कह कर या तो टाल देते हैं या किसी  बताई हुई बात से इस का हवाला दे कर सोचना छोड़ देते हैं|

मैं इस जहाँ को, इस पुरे निज़ाम  को कुदरत(प्रकृति) के नाम से जानना पसंद करता हूँ|  प्रकृति अपने आप में  ही सब कुछ है, ये आत्म निर्भर है, ये सब को बराबर नज़र से देखती है, इस की नज़र में  सब की अपनी-अपनी एहमियत है, चाहे पत्थर हो या पेड़, फल हो या टहनी, हवा हो या पानी सब की अपनी एक एहमियत है, अपनी-अपनी खूबसूरती है, सब घटक एक दुसरे की कमी या अधूरेपन को पूरा करते हैं, सब एक दुसरे से अलग हैं पर एक दुसरे के साथ चलते हैं, एक दुसरे के कम या ज़्यादा होने  से सब पर  असर पड़ता है| हवा जब चलती है तो अपने साथ बहुत कुछ उठा ले आती है कहीं से पराग्करण तो कहीं से बीज, कही से फूलों   की खुशबू उठा लेती  है और जो-जो रास्ते मैं आता है सब को बराबर बिना किसी भेदभाव के बांटी जाती है|  प्रकृति में  सब घटक एक दुसरे से मिल कर एक निज़ाम (तंत्र) बनाते हैं जहाँ सब का बराबर ख्याल रखा जाता है, सब अपने आप में  पूरे भी हैं और अधूरे भी, पानी जब बरसता है या बहता है तो वो सब के लिए मौजूद  होता है, उसी पानी में  छोटे-छोटे जीव अपना आशियाना बनाते हैं और उसी पानी को लेकर पौधे  ऑक्सीजन बनाते हैं, हरे-भरे जंगल लहराते हैं और जानवर उस से अपनी प्यास बुझाते  हैं, इस की एहमियत एक हाथी के लिए भी उतनी ही है जितनी कि चूहे  या किसी और क़द से छोटे जानवर के लिए| यहाँ जब सूरज अपनी किरणे  छोड़ता है तो वो बिना पहचान किये हुए सब पे बराबर पड़ती हैं सब उन से उर्जा प्राप्त करते हैं और उस उर्जा को अलग-अलग काम में  इस्तेमाल करते हैं| पत्ते  खाना बना लेते हैं, पानी भाप बन के उड़ जाता है, बहुत सारी रासायनिक, भौतिक  और जैविक  प्रक्रियाएं होती रहती हैं|

अगर देखा जाये तो हर एक जीव खुद अपने आप में  प्रकृति है, एक पौधा  सिर्फ एक तने या जड़ का नाम मात्र नहीं है, बल्कि  उसके सारे अंग मिल कर उस से एक पौधा  बनाते हैं जो खुद में  एक सिस्टम है, जिस में  सब के अपने-अपने काम हैं और सब बखूबी निभाते हैं, सब के काम की अपनी अपनी एहमियत है और हर एक के काम से दुसरे का काम प्रभावित होता है| पत्ते  जड़ पे निर्भर करते हैं, जड़ मिट्टी पानी और खाद पे निर्भर करती है| अब इसी सिस्टम को प्रकृति के अन्य घटकों  की भी ज़रूरत पड़ती है जैसे- हवा, पानी, रौशनी| तो बहुत सारी चीजें मिलकर एक तंत्र बनाती हैं| ऐसा ही हम अन्य जीवों  जैसे जानवरों  में  देखते हैं|
अभी तक यहाँ कोई भेद भाव, ऊँच-नीच, तेरा-मेरा, बेकार-कामगार, सही-गलत कुछ नहीं आया है, प्रकृति में  जितने स्रोत हैं वो सब के हैं और ज़रूरत के हसाब से सब उनका इस्तेमाल कर रहे हैं| फिर एक और जीव धरती पर आया जिसे हम इन्सान कहते हैं, उसके आने के बाद तक भी प्रकृति के निज़ाम  अपने तरीके से चलते रहे| तब कोई सरहद या लकीर नहीं थी, तब कोई बटवारा नहीं था, तब प्राकृतिक स्त्रोतों  पर चंद लोगों का क़ब्ज़ा नहीं था| अब तो सिर्फ ये तस्सवुर  ही किया जा सकता है|

इन्सान के आने के बाद और  धरती के अलग-अलग कोनों में  पहुँचने के बाद यहाँ की तस्वीर बदलने लगी| इस प्रजाति की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी, इसके कारण अस्थानीय स्त्रोतों  पर भारी दबाव पड़ने लगा और इस कारण उस ने एक जगह  से दूसरी  जगह  जाना  शरू किया, इसी प्रक्रिया  के चलते ये पूरी दुनियाँ में  पहुँच गया, सोचने लगा, विचार करने की क्षमता पैदा कर ली, स्रोतों  पे क़ब्ज़ा करने लगा, और लड़ाई करने लगा| ज़रूरत ने उससे दूसरे जानवरों  का और पौधों  का खुद के लिए इस्तेमाल करना सिखा  दिया| दुश्मन और दोस्त बनाने लगा, ताक़त हासिल करने लगा और खुद को औरों  पर भरी साबित करने लगा| तब उस ने प्रकृति को अपनी जायदाद समझना शरू कर दिया| अब प्रकृति के अपने निज़ाम  में  तब्दीली आने लगी| कभी कहीं बाढ़  और कहीं सूखा आने लगा|

वक़्त गुज़रता गया और इन्सान अपने हाथ पाओं बढ़ता गया, दिमाग में  सोचने की क्षमता और बढ़  गयी, अब उस ने अन्य जीवों  को अपने अलग-अलग इस्तमाल में  लाना शरू कर दिया, और इतने से शरीर वाला इन्सान दुनियाँ का मालिक बन बैठा| उसे ने पूरी पृथ्वी पे लकीरें खींच कर, दीवारें बना कर इस को बाँट दिया, जो पृथ्वी कभी  सब की हुआ करती थी और सब उस के हुआ करते थे, अब वो लाकीरों  में  बंट कर मेरी और तेरी रह गयी| फिर जैसे-जैसे इन्सान ने तरक्की  की वैसे-वैसे और भी बदलाव आने लगे| धर्म  बन गये, अलग-अलग विचार धाराएँ जन्मी, अलग-अलग गुट बन गए|  सारी दुनियाँ को मुलाकों में  बाँट दिया| लाकीरों  के हिसाब से लोग भी बँट गए|

उंच-नीच, बुरे-अच्छे , हमारे लोग तुम्हारे लोग, हमारी बिरादरी उनकी बिरादरी, हमारा धर्म  उनका धर्म ऐसे कई  सारे अंतर पैदा हो गये| ज़मीन के टुकडों पर  लड़  कर एक दुसरे की जान लेना, अपने ही जैसे इन्सान को दुश्मन कहना उससे नफ़रत करना बहादुरी माना जाने लगा| इन्सान ने अलग अलग निशाँ बना लिए, लिबास चुन लिए, धर्म चुन लिए, अपनी-अपनी पहचान बना ली, कुछ न कुछ ऐसा किया जिससे एक समूह दुसरे से अलग लगे| काम का बटवारा कर लिया और एहमियत भी तय कर ली किसी काम को महान और किसी  को नीच कहा जाने लगा, उसी  तरीके से महान काम करने वाले महान कहलाये और नीच काम करने वाले को नीच और दरिद्र कहा जाने लगा| ज़मीन पे कुछ लोगों का क़ब्ज़ा हो गया और बहुत लोग इस से वंचित रह गए| आगे चल कर  इन्सान ने इसी तर्ज़ पर बस्तियां बसाई| काम के हिसाब से, बिरादरी या धर्म  के हिसाब से, अमीर और गरीब के हिसाब से समाज कई  सारी परतों में  बाँट दिया गया| इन्सान तरक्की  तो करता गया लेकिन एक गलती साथ लिए चला  जब भी उसके मन में  कुछ सवाल उठे उस ने खुद उत्तर  खोजने  के बजाये किसी और से उसके उत्तर  पूछे, और बेवकूफ बनता गया| बहुत सी संस्थाएं बन गयी जो समस्या निर्माण भी  करने लगी और समाधान भी देने लगी इस प्रथा ने भक्ति को जन्म  दिया और सिखाया कि सवाल उठाना मना है , तुम सिर्फ सुन सकते हो,  सवाल नहीं उठा सकते |

नतीजा ये हुआ के उस ने हर जगह सरहदें बना लीं, लकीरें खींच दीं, सब कुछ बाँट दिया, पहचानें बना ली और फिर उन पहचानों को बचाए रखने की खातिर दूसरों से लड़ने लगा| खुद को अपने से अलग विचार वाले से असुरक्षित महसूस करने लगा| अब ये दीवारें सिर्फ ज़मीन के टुकडों पर नहीं बल्कि  उसके दिमाग में  खिच गयीं| उस के दिमाग में  अलग तस्वीरें छप गयी और वो दुनियाँ को उसी नज़रिए  से देखने लगा| उस ने हर उस चीज़ का फ़ायदा उठाना शरू किया जिससे उसको सत्ता और सम्पति मिले|  अब देखते-देखते प्रकृति की तस्वीर बहुत बदल गयी|

आज हर कोई छाती पीट-पीट कर, डंका  बजा-बजा कर ये कहता मिलता है कि मेरा धर्म  तेरा धर्म , मेरा देश तेरा देश, मेरी मस्जिद मेरा मंदिर, मेरा  गिरजा घर, आज हर कोई दुसरे का पल में  दुश्मन बन जाता है, जो कल तक तुम्हारे साथ हँसता खेलता था, साथ खाता था वो आज पराया और दुश्मन बन जाता है| इस पार से देखो तो उस तरफ खड़ा इन्सान दुश्मन लगता है लेकिन उस तरफ से जा कर देखो इस पार खड़ा इन्सान भी दुश्मन लगता है गोया कोई किसी के लिए मित्र है और वही किसी के लिए दुश्मन है बस नज़र- नज़र का फ़र्क है| ऊपर  से देखो तो दोनों -दुश्मन भी और सज्जन भी बेवकूफ लगते हैं| इन्सान ऐसा कैसे हो गया? ये सवाल अक्सर चोट करता है लेकिन ये इन्सान पल भर में  ऐसा नहीं हो गया इस को ऐसा होने में  बहुत वक़्त लगा है| ये ऐसा इसलिया हुआ क्यूंकि इस ने अपने सवालों  के उतर किसी  और से मांगे, अपना रहबर किसी और को बनाया, कभी कोई सवाल ही नहीं पूछा पलट कर, तर्क  करना छोड़ दिया तो नतीजतन आज इन्सान ऐसा हो गया कि कोई कुछ भी कह जाये उस से मान  लेने को तैयार हो जाता है| वो जन्म  से लेकर मौत तक और उसके बाद भी बहुत सारी जंजीरों  में  बंधा है|  जिन्हें वो तोड़ना ही नहीं चाहता और चाहे भी तो  समाज तोड़ने नहीं देता बल्कि  और बांध देता है|

आज ऑफिस से निकलते ही किसी का इंतज़ार करना पड़ा| मेरी आदत है और अब शौक  भी बन गया है जब भी मौक़ा मिले बच्चों  के साथ खूब बात करना, चाहे वो कोई भी हो, कहीं का भी हो, क्यूंकि  मै मानता हूँ कि बच्चे कम से कम कुछ हद तक साफ़ होते हैं ऐसे ही जैसे ग्लोब पर  कोई लकीर न खिंची हो| बच्चे  क्रिकेट खेल रहे थे, ठीक मंदिर के सामने, खेलते खेलते अचानक गेंद मंदिर के अन्दर चली गयी| ये कोई नयी बात नहीं थी ऐसा पहले भी कई  बार हो चुका था लेकिन आज किस्सा कुछ अलग सा था, दोनों  मुझे अन्दर जा कर गेंद लाने को कहने लगे, पर मैंने  मना कर दिया और उन से पुछा के आप क्यों नहीं जा रहे| उन्होंने बोला  कि हम नहीं जा सकते क्यूंकि  मंदिर हमारा नहीं है, हम अन्दर नहीं जा सकते मम्मी ने मना किया है| मेरे और पूछने पर उन्होंने  बताया कि वो अलग बिरादरी के हैं इसलिए मंदिर में नहीं जा सकते | हमारी बिरादरी वालों  की मस्जिद होती है| जब मैंने  और तफसील से पुछा तो बोले मंदिर भगवान का होता और भगवान हमारा नहीं है  हमारा तो अल्लाह है| हमें अल्लाह ने बनाया है और इन लोगों को भगवान ने बनाया है| खैर, थोड़ी देर बहस करने के बाद एक ने हिम्मत की और जा कर गेंद ले आया लेकिन एक वादे पर कि  कोई घर नहीं बतायेगा| अब इत्तेफ़ाक से पूरी गली के बच्चे  आजतक ये पता नहीं लगा पाए के मेरा धर्म  क्या है| जब भी उन्होंने  पूछा मैंने  चार सवाल और पूछ लिए| उस की एक बात मुझे और अजीब लगी के वो रोज़ा की हालत में  अगर मंदिर के अन्दर जायेगा तो उसका रोजा टूट जायेगा| अब ये बात उसको जिस ने बताई हो मगर एक बात साफ़ है के सरहदें बननी शरू हो गयी हैं, और कल आते-आते दीवारें बन जाएँगी|

अब मेरी  ये बात बहुत लोगों के लिए एक आम सी बात हो सकती है और ये भी मुमकिन है कि बहुत लोग इस से कोई ख़ास बात न समझें लेकिन मेरे लिए काफी एहमियत रखती है क्यूंकि  ऐसी ही बातें  और बच्चों  से सुन चूका हूँ जिन की नज़र में  मस्जिद और मस्जिद में  जाने वाले लोगों के बारे में  कुछ ऐसी ही राये है| असल में  बात वाही है कि दोनों नदी के आर पार खड़े हैं  दोनों एक दुसरे को गलत समझते हैं| लेकिन बीच की सचाई से दोनों दूर हैं और शायद ही कभी रूबरू हो पायें| आज की दुनियाँ शायद यही है बहुत तो ये भी सुझाव देते हैं के अगर रहना है तो ऐसा ही होना पड़ेगा| अब सवाल ये के आप क्या चाहते हैं नदी का किनारा या नदी की गहराई|

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