नाराज़गी खुद से
पता नहीं ये मेरी जिद है या छुपी हकीकत कोई
मैं लाख गुज़ार्शें करता हूँ, फ़िर भी खुद को मना नहं पाता|
एक बात तो पक्की है की मैं खुद से खफा हूँ
नाराज़गी इतनी है की मैं खुद से नज़रें मिला नहीं पाता|
आज खुद को तिराहे पे खड़ा पाता हूँ मैं
किस रास्ते को छोड़ना है किस पे चलना है, मैं खुद को समझा
नहीं पाता|
है कुछ भी नहीं, सिवाय ख्यालूँ के मेरे
ये जानता हूँ फ़िर भी ये उलझन सुलझा नहीं पाता|
कहीं बार कुछ रास्ते अपने घर को जाते दिखते हैं धूर से
फ़िर कोई आ कर बता जाता है की ये रास्ता तेरे घर तक नहीं
जाता|
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