लफ्ज़ और हकीकत
बड़ी आसानी से मोहब्बत का दावा कर गया कोई,
मैं चुप रहा, कुछ कह न पाया, मुस्कुरा कर दर-गुज़र कर आया|
लफ्ज़ों की खूबसूरती से मोहब्बत का क्या लेना देना,
लफ्ज़ हैं ये ज़रूरत -ओ- वक़्त के साथ बदल जाया करते हैं, लफ्ज़ों में क्या रखा है|
अब इन लफ्ज़ों को मैं दिमाग तक आने नहीं देता,
सुनता हूँ, सुन कर बोलने वाले को लौटा आता हूँ, सो मैं यही कर आया|
अब जैसे मोहब्बत किसी दूर पहाड़ में बसी किसी बस्ती सी लगती
है,
जो दूर इतनी होती है कि जो भी उसकी तलाश में गया, खुद को ही भूल आया|
मोहब्बत तो किसी लफ्ज़, तस्वर, मुज़ाहिरे की मोहताज नहीं होती,
अगर हो तो हमेशा रहती है, बिना किसी डर,
दावे, दिखावे या इज़हार के|
बाकी सब तो सिनेमा के किस्से हैं, देर तक जिंदा नहीं रहते,
किरदार बदलते हैं तो किस्से बदल जाया करते हैं, ये फैसला मैं खुद से करके, हाथ जोड़ माफ़ी मांग आया|
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