Friday, March 27, 2020



                                 फ़िक्र 

 

ये रात का सनाटा, ये बारिश की आवाजें, ये खोफ से भरा मौसम,
सोयी है दुनियाँ नींद आराम की और मुझे है फ़िक्र  तेरी||

मैं हूँ ठीक की  नहीं ये पूछना तो चलो हुई बात निराली,
 तू है कैसा ,किस हाल मैं है, मुझे सताती है बहुत फ़िक्र  तेरी|| 

 आज जब के दुनियाँ परेशान हाल है काफी, हर तरफ उदासी ही उदासी है,
मुझे होती है हर हाल फ़िक्र   तेरी||

तू लापरवाह है बहुत ये बात तो पता है मुझे,
तेरी ये लापरवाही बढ़ा देती है फिकर  मेरी||

मैं दुआगो हूँ की  तू बस अच्छा हो, खुश हो,
मुझे तो अभी सोचना है कैसे कटेगी ये रात मेरी||

                                                                                 
शफीक||

Tuesday, March 24, 2020

       

                        ये कोई काम थोड़ा ही है, कोई भी कर सकता है.                             


जब भी मैं खाना बनाता हूँ , अक्सर बर्तन में थोड़ा पानी छूट जाने के कारण तेल के कुछ गरम कतरे मेरे हाथों को जला दत्ते हैं, कुछ कतरे तो चेहरे पर भी पढ़ जाते हैं, अब तो उनके निशान भी हाथों  और चेहरे पे आसानी से दिख जाते हैं, काफी दर्द होता  है जब जलन होती  है तो, इसी दौरान मेरा ख्याल अपनी माँ और बहन, परिवार की अन्य महिलाओं की तरफ जाता है, फिर जो लोग छोटे छोटे ढाबों या होटल्स मैं खाना बनाने का काम करते हैं उनकी तरफ भी ध्यान जाता है. कैसे घरू मैं महिलाएं बिना कुछ बोले, आग पे जल कर, आंखू से आंसू बहा कर, घंटों तक खड़े हो कर खाना बनाती  हैं, और वो भी दिन मैं तीन तीन बार , कभी कभी तो मेहमान जाते हैं तो बहुत लोगू के लिए, अलग अलग प्रकार  का खाना बनाना पड़ता  है, खाना बना कर फिर परोसना भी है, उसके लिए बहुत से बर्तन भी चाहिए, उनको साफ़ भी करना है, अछे से अगर खाना परोसा तो नजाने क्या क्या सुनना पड़े  गा, ऐसी कहीं बातें सोच कर वो परेशान रहती हैं. फिर खाना कम  पड़ जाये, खाने मैं कोई चीज़ कम -ज्यादा हो जाये, मेहमान क्या सोचेंगे खाने के बारे मैं वघेरा वघेरा. सब कुछ करने के बाद भी उनका काम ख़तम नही होत्ता, अभी बर्तन भी साफ़ करने हैं, रसोई भी साफ़ करनी है, और अगले खाने की त्यारी का तो पता ही नही अभी , वो भी सोचना है. देखा जाये तो इसी  में उनका दिन या वक़्त गुजर जाता है. कभी कभी खुद के खाने का ख्याल भी नहीं रहता, पर कोई बात नही घर वालों के लिए खाना पूरा होगया सोच कर सबर कर लेती हैं.
ये सब मैं ने अपने ही परिवार मैं देखा है और शायद सब जगह होता हो गा, हमारे यहाँ जब लड़कियां बढ़ी होती हैं तो उन्हें दुनियां की बातें कम बताई जाती हैं , ये समझाया जाता है के तुम्हें चूल्हा -चोका अछे से आना चाहिए, ये एक औरत का गुण होता  है, नही तो सुसराल मैं गुजर कैसे हो गी तुम्हारी, नाक काट के वापिस छोड़ दे गा कोई, बेचारी लड़की बचपन से ही अपनी माँ के नक्श--क़दम पे चलने लग जाती है, जो वो करती है वो सीखने की कोशिश मैं रहती है, दुसरू की झाड और डांट सुनना सीखती है. कोई मेहमान आयेगा, या घार का कोई बढ़ा कुछ मांगे गा तो हुकम लड़की को ही बजाना है , कहीं देर होगई तो दस बातें सुन्नी पढ़ जाएँगी, रात भर भूका सोना पढ़ेगा, माँ की डांट खानी पड़ेगी. ये सब देखते देखते एक लड़की-औरत बन जाती है, जब वो किस्सी के सामने मूह नहीं खोलती तो उससे आज्ञाकारी या फर्मंबरदार कहा जाता है, जब वो सो बातें भी सुनकर चुप रहती है तो उस से सहनशील या सबर  वाली कहा जाता है. वो देर से सोती  है और जल्दी उठ जाती है , सारे काम वक़्त पर कर देती है, कभी कभी रात दिन का ख्याल भी नहीं करती तो उससे मेहनती कहा जाता है. चलो अब काफी गुण गए हैं, अब इस की शादी कर दत्ते हैं, अब ये किस्सा भी बढ़ा अजीब है, शादी किसी  को करनी है , साथ किसी  को रहना है, ज़िन्दगी किसी  की है, लेकिन  फैसला कोई करेगा, क्यूँ के उनको ये अधिकार है, उस लड़की को अपने अछे  बुरे  का क्या पता, अब अजीब बात ये है के सब फैसले कर के आखिर मैं पुछा जाता है-देखो हम ने तो तुम्हारे भले के लिए ही सब कुछ किया है, आगे जो तुम्हारी मर्ज़ी हो बता देना , हमें लड़के वालू को जवाब देना है. अब उसके पास हाँ के सिवाय कोई विकल्प है ही नहीं, सवाल करना तो सीखा ही नहीं था, बचपन से ही आज्ञाकारी थी, जो कहा सर झुका कर मान लिए, अब ना का तो सवाल ही नही पैदा होता. फिर ना कह भी दी तो माँ बाप , रिश्तेदार क्या सोचेंगे, ऐस्सा रिश्ता फिर कहाँ मिलेगा, कब तक घार पर बेठी रहेगी. ऐसी कहीं बातें सोच कर वो हाँ केह देती है. शादी होगयी , दुसरे घर चली गयी, अपनी माँ से जो जो सीखा था , बखूबी करने लगी, सब का ख्याल, सब की सेवा, सारे काम, यही सब करते करते उम्र गुजर गई, हर दिन तीखी आड़ी बातें सुनी पर जवाब नही दिया, अब अपनी बेटी को भी यही सिखा रहीं हैं, ये तो चलता ही रहेगा ना.
दिन मैं कहीं घन्टे काम किया, कुछ नहीं माँगा, किसी से शिकायत नहीं की, सब कुछ सुना, सहा. किसी ने कभी ये नहीं कहा के तुम भी काम कर के थक गई हो, ज़रा आराम कर लो. उल्टा जब बात आई तो ये सुनना पड़ा के तुम करते क्या  हो घर पे, घर का काम भी कोई काम होता है, कमा के कोन लाता है, एक दिन मेरी तरह कमा के लाओ तो पता चले. घर के पुरुष अपने काम को अपनी शान समझते हैं, लेकिन घर का काम तो उनके सामने बेकार काम है भला इसके पैसे थोड़े ना मिलते हैं. काश महिलाएं ये हिम्मत जुटा पति और बोल पति के हम महीने भर की छुट्टी जा रहे हैं , अब आप घार का काम देख लेना, तो साहबजादे को एहसास होता के घर का काम भी दुनिया के और कामू जितना ही ज़रूरी और कठिन है.
मेरे घर  से आजकल मुझे एक शिकायत ज़रूर आती है, के तेरी बहन काम को हाथ तक नहीं लगाती, और घर वाले उस से बहुत नाराज़ रहते हैं, बस सिर्फ इस लिए के वो पूछती है मैं ही क्यूँ घर का काम करू ? आपके बेटे क्यूँ नहीं करते. ये सुन कर मुझे ख़ुशी होती है के कम से कम वो सवाल तो पूछती है, सवाल पूछना ही पहली कड़ी है किसी प्रथा और गलत चीज़ को सुधारने की. क्यों के  सवाल पूछने से हमें लोग थोड़ी देर के लिए बुरा ज़रूर कहेंगे, अलग थलग ज़रूर करेंगे, लेकिन अगर हिम्मत रखी  तो वही लोग कल आप की मिसाल भी देंगे, आखिरकार लोग तो लोग हुए ना, जो सही लग्गे बोलेंगे , लेकिन ज़रूरी नहीं हर बोली हुई बात सही ही हो . किसी  भी सत्ता को मानने से पहले उस पे सवाल ज़रूर उठाना चाहिए , नहीं तो फिर चाहे  घर हो या  सामाजिक तंत्र,  कब आपको  गुलाम  बना दे , पता भी नहीं चलगे और हम उम्र  भर उस्सी गुलामी  को ज़िन्दगी सामझ  कर जीते रहेंगे.

                                                                                              २४/०३ /२०२० -रुद्रप्रयाग

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                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...