अजब दस्तूर था शहर में तेरे
अजब
दस्तूर देखा शहर में तेरे
जो
गुनाह था मेरे लिए , वो बस एक आम सी बात थी शहर में तेरे|
वो
जिन बातों को मैं गलत मानता रहा उम्मर भर
फ़िर
पता चला की सब जायज़ था शहर में तेरे|
मुझे
तो बस इतना पता था की लफ्ज़ काफी होते हैं भरोसे के लिए
फ़िर
इल्म हुआ की लफ्ज़ महज़ लफ्ज़ थे शहर में तेरे|
तेरी
सादगी और सचाई देख कर तू कुछ अलग सा लगा था
अब
एहसास हुआ की सब एक जैसे दिखते हैं लोग शहर में तेरे|
इलाज
तो ये है की हम कूच कर जाएँ
हमें
कुछ समझ नही आता अब इस शहर में तेरे||
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