Wednesday, December 30, 2020

                                                 अजब दस्तूर था शहर में तेरे 



अजब दस्तूर देखा शहर  में तेरे

जो गुनाह था मेरे लिए , वो बस एक आम सी बात थी शहर  में तेरे|

वो जिन बातों को मैं गलत मानता रहा उम्मर भर

फ़िर पता चला की सब जायज़ था शहर  में तेरे|

मुझे तो बस इतना पता था की लफ्ज़ काफी होते हैं भरोसे के लिए

फ़िर इल्म हुआ की लफ्ज़ महज़ लफ्ज़ थे शहर में तेरे|

तेरी सादगी और सचाई देख कर तू कुछ अलग सा लगा था

अब एहसास हुआ की सब एक जैसे दिखते हैं लोग शहर  में तेरे|

इलाज तो ये है की हम कूच कर जाएँ

हमें कुछ समझ नही आता अब इस शहर  में तेरे||


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