भोझ हो या डर-समझ कर छोड़ना अच्छा
यकीन
मानो भोझ कितना भी अच्छा क्यूँ न हो भोझ ही होता है, जब लगने लगे की कोई चीज़
तुम्हारे लिए भोझ बनने लगी है तो मुस्करा कर छोड़ आना चाहिए| ये शायद बे-मन से,
मजबूरी में साथ निभाने से कहीं अच्छा होता है| हमारा शरीर भी तो जरा सा भोझ भी सह
नही पाता, वक़्त पे सोचाल्ये न जा पाओ तो तकलीफ होने लगती है, नाख़ून -बाल बड़े हो
जाएँ तो अजीब लगने लगता है| ये शायद कुदरत का नियम भी है| हर इंसान की, हर चीज़ की
अपनी एक एहमियत हुआ करती है, ये निर्भर करता है पहचानने वाले पर, परखने वाले पर|
हम पहचान नही पाते, असली भोझा भी कभी नाकाम नही होता, जहाँ सूखी घास भूस पड़ी हो
वहां नमी अक्सर ज्यादा रहती है| खेर, कुछ भी अगर भोझ लगने लगे तो छोड़ आना चाहिए, आज़ाद ज़िन्दगी भले ही
मुश्कालूँ से भरी हो, आराम की घुलामी से कहीं अछि होती है|
डर
भी कुछ ऐसा ही होता है, अगर हम डरने लग जाएँ तो वक़्त से पहले मर जाते हैं, जीने के
लिए डर डर कर मर जाना अजीब होता है| ये बात सच है की डर हमें कमज़ोर बनता है, गलत
काम करने पर मजबूर करता है, अतम्विश्वास कम करता है| अगर देखें तो हम कितने सारे
डर से गिरे हुए हैं, किसी को खो देने का डर, मर जाने का डर, अकेलेपन का डर, अपनी
पहचान खो देने का डर, इज्ज़त का डर| जिस भी चीज़ से हमें डर लगने लगे तो उससे भागना
कोई उपाए नही होता, उसका सामना कर उससे समझना होता है और समझ कर उस रास्ते को छोड़ना
होता है| अपने ही डर से जीतना ज़िन्दगी की शरुआत कहलाती है, अगर कर पाओ तो|