बोझ
न रंज-ओ-ग़म , न कोई एहसास बा-ज़ाहिर होने देता हूँ
ये देख कर साथी आजकल अक्सर हैरान रहते हैं|
बड़े से बड़े दुख को एक हंसी में उड़ा आना
झूठ ही सही पर इससे हुनर-ऐ-इंसान कहते हैं|
बहुत अच्छा है कुछ बातों को मज़ाक मान कर दर-गुज़र कर आना
जितना भूलता हूँ उतना बोझ कम होता चला जाता है-
बड़ी काम की दुआ है जिससे मंद मुस्कान कहते हैं|
कभी चुप रहना, कभी खुल के बोल जाना
हम भी दुनियाँ के इम्तेहान में हरदिन कुछ अच्छा-बुरा सीख
आते हैं|
न कोई उम्मीद, न बातों पे लोगों की कोई शक न भरोसा
लफ्ज़ हैं सुनता हूँ, सुनकर उन्हें कहीं खाली जगह फ़ेंक आता
हूँ|
कोशिश तो ये है की हर दिन कुछ न कुछ पानी में बहा आया करू
बहुत भरा भरा है घर मेरा, कुछ चीज़ें न चाहते हुए भी फ़ेंक
आता हूँ||
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