खुद से बातें
बैठ
कर रोने का मन तो मेरा भी है, होता भी है,
बहुत
सारी आँखों से आँसू पोछने होते हैं, मैं भला रोऊ कैसे?
दिल
तो चाहता है छोड़ दुनियाँ कहीं दूर चला जाऊ
कुछ दिन,
बहुत
चेहरों की वाहिद मुस्कान हूँ मैं, मैं कहीं जाऊं कैसे?
मैं
हफ्तों चुप रह सकता हूँ, घने जंगल की ख़ामोशी की तरह,
मेरी
आवाज़ सुन कर मुस्कान आती है कितनों के चेहरों पर, मैं चुप रहूँ कैसे?
कभी
अगर मायूस होता भी हूँ तो अपने आप सवाल
करने लगते है,
तुझे
चलना है निरंतर, तुझे रुकना नहीं है, बताओ
मैं इधर-उधर जाऊ कैसे?
मेरी
हंसी झूठी सही, किसी के काम तो आती है,
मैं
हँसते-मुस्कराते फूलों के सामने आपना रंज-ओ-ग़म दिखाऊ कैसे?
एक
ज़िन्दगी से लड़ाई, खुद से करता हूँ मैं सौ-सौ तकरार,
फ़िर
हर तरफ ज़िम्मेदारियाँ हज़ार, मैं भला सो जाऊं कैसे?
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