Tuesday, September 26, 2023

                                                                     خود سے ایک گفتگو 


باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی انسان کے من کی ہوتی ہے، باہری خوبصورتی تو محض ایک نقاب ہے جو صرف دِکھتا ہے شاید ہوتا نہیں. اکثر لوگ مِل جاتے ہیں جو ظاہراً اتنے دلکش نہ ہوں لیکن من سے بےحدخوبصورت ہوتے ہیں، ایسے لوگ ہر روز ہمارے آسپاس ہمیں ملتے ہیں لیکن ہم انہیں درگزر کر دیتے ہیں، شاید ہم بس باہری خوبصورتی کو کھوجتے رہتے ہیں، کِسی کو پرکھنا ایک ہنر ہے جو سب میں موجود نہیں ہوتا، وہ نظر ،وہ نظریہ، وہ آنکھیں جو سب میں خوبصورتی کھوج لیتی ہوں وہ آنکھیں دنیا کی سب سے خوبصورت چیز ہیں.  

کوئی خوبصورت ہے يا نہی یہ ہماری سمجھ اور ہمارے اندر کی خوبصورتی اور انسانیت تے کرتی ہے، سوچو اگر ہم سب اپنے اندر خوبصورتی پیدا کر لیں تو ہمیں سب کتنے خوبصورت لگنے لگیں گے، خود کی طرح


کچھ لوگ ہوتے ہیں جو صرف خوبصورت نہی بلکہ بےحد خوبصورت ہوتے ہیں، اُنکے چہرے سے وہ خوبصورتی وہ روحانیت وہ نرم مزاجی، وہ اپنا پن جھلکتا ہے. مانو جیسے بنانے والے نے انکو سب کچھ بخشا ہو اور انہیں پتہ ہی نہیں ہو. ہماری سیرت، صورت اور برتاؤ ہمیں اور خوبصورت بناتا ہے، جو ہوتے ہیں وہی دِکھتے ہیں، جو بولتے ہیں وہ کرتے ہیں ، یہ عادتیں انہیں مزید دلکش اور حسین بناتی ہیں. میں خوش ہوتا ہوں کے میں ایسے لوگوں سے مِل پاتا ہوں ،انہیں سمجھ پاتا ہوں اور ان سے سیکھ پاتا ہوں، شکرگزار بھی رہتا ہوں جیسے میرے بننے میں انکا بھی ہاتھ ہو


ابھی کشمیر جانا ہوا تھا، ہے من سے گیا تھا لیکن جانا ضروری تھا، سوچ رہا تھا کب لوٹ کے آؤں گا، پھر کچھ لوگوں سے ملاقات ہوگئی جو پہاڑوں سے اپنے جانور واپس لا رہے تھے، اُن سے ملا تو الگ سا احساس ہوا ، اُنکی سادگی، نرمی اور من کی خوبصورتی دیکھ کر لگا کے زندگی کچھ نہ ہو کر بھی کتنی خوبصورت ہے. بزرگ اور بچے اتنے صاف اور شفاف اُنکے چہرے تھے، نظریں تھیں، لفظ تھے کے میں بتا نہی سکتا. وہ معصومیت بہت نایاب تھی. اُن سے باتیں کرکے لگا وہ کتنے مصیبت میں رہ کر بھی خوش رہتے ہیں، گھر ہے نہ باہر لیکن خوش ہیں، زندگی سے ناراضگی نہی، شکایتیں نہیں. سفر ہمیں بہت کچھ سکھاتا ہے، ہمیں اپنے خیالوں کو بدلنے پر مجبور کرتا ہے اور ہم سیکھتے چلے جاتے ہیں. زندگی ایک سفر ہی ہے ،نکلوگے تو بہت کچھ دیکھو گے.


خود سے ایک گفتگو -سحر

٢٥ ستمبر ٢٠٢٣ - بانهال رامبن - جموں






Monday, September 18, 2023

 चेनाब और वो कहानियां 

आज बहुत सारा काम था, शाम हुई तो अजीब सा महसूस हो रहा था, घर आने का मन नही हो रहा था, आज तवी में पानी भी काफी कम था तो उसके किनारे जाने का मन भी नही हुआ, फिर सोचा क्यों न आज चिनाब के किनारे बैठने चला जाऊं| चेनाब वहां से बस दस किलोमीटर दूर थी और में चला गया|

वहां पहुंच कर बहुत खूबसूरत लगा, शाम ढल रही थी, लोग अपने घरों को लौट रहे थे, बहुत सारे परिंदे चहचा रहे थे, नदी बिलकुल शांत थी और ठहरी सी थी, मानो जैसे पहाड़ों से उतर कर थक सी गई हो| में किनारे बैठा, दूर दूर तक कोई नही था बस पेड़, परिंदे, ढलती शाम और नदी की शांत आवाज़| में ने पैर पानी  में रखे तो ऐसा महसूस हुआ जैसे मां ने दिलासा दिया हो, में खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा था जैसे सारे फिक्र और चिंताएं पानी अपने साथ बहा ले गया हो|

नदी के उस पार एक गांव था, कच्चे घर जो मिट्टी से लीपे हुए थे और लोग अपने जानवरों को वापिस ला रहे थे|


तब मुझे बहुत सी बातें याद आईं जो बचपन में कहानियों में सुनी थीं, मेरे लिए चिनाब सिर्फ एक नदी नहीं है, बहुत कुछ है| प्रेम क्या होता है सबसे पहले मैं ने चेनाब की कहानियों में ही सुना था, बड़े दादा को कहानियां सुनने का बहुत शौक था वो मुझे बचपन में बहुत सी कहानियां सुनाया करते थे, वो कहते थे हमारा गांव चेनाब और जेहलम के बीच में पड़ता है इसी लिए इतना ठंडा और खूबसूरत है| तब मैं इन दोनों नदियों के तसवर किया करता और सोचता रहता कि आखिर कैसी दिखती होगी चेनाब| 

सब कहानियों में से मुझे हीर और रांझा की कहानी बहुत खूबसूरत लगती थी, उस कहानी में प्रेम के वो एहसास थे जो में महसूस किया करता था, हीर और रांझा एक दूसरे से बेहद प्रेम करते थे मगर वो नदी के किनारे बसे दो अलग अलग गांव में रहते थे, उस वक्त नदी को पार करना बहुत मुश्किल था तो वो कभी भी एक दूसरे से मिल नही पाते थे, कहते हैं वो एक दूसरे को संदेश भेजते थे मिट्टी के घड़े में रख कर| कभी कभी जब रांझा को बहुत याद आती तो वो शाम को नदी किनारे चला जाता और हीर अपने घर में दिया जला देती, वो उस दिए को देखता और सोचता हीर को देख रहा है| उनकी बस इतनी सी मुलाकात हो पाती थी| कितना पवित्र और खूबसूरत रिश्ता था| में तब भी ये सोचता था कि उनको कितना बुरा लगता होगा, उनको कैसा महसूस होता होगा| 


में बड़े दादा से बहुत सवाल पूछता और दादा हंस देते और बात को टाल देते| हीर और रांझा की कहानियां हमारे पहाड़ में और पंजाब में बहुत सुनाई जाती हैं, जब मैं बड़ा हुआ और पहली बार चेनाब को देखा तो मेरी नजरें हीर और रांझा की कहानी डूंड रही थीं| वो पहले पहले एहसास थे प्रेम के| आज भी याद हैं| आज वहां बैठ कर सारी बातें याद आईं, बहुत अलग महसूस हुआ|

देख रहा था आज चेनाब को पार करना कितना आसान है मगर आज कोई हीर और रांझा नही हैं, हो ही नही सकते, प्रेम है ही इतना नायाब कि हर जगह नही मिलता| वो कहानियां आज भी कितना असर डालती हैं मन पर, कितनी सच्ची लगती हैं, शायद सच हमेशा रहता है|


हीर और रांझा कभी मिल नही पाए थे और उसी नदी में समा गए थे लेकिन वो आज भी कितने मोजूद हैं हमारी कहानियों में, इस नदी की खामोशियों में, इस ठंडक में, इस बहाओ में| 

शाम हो गई थी, में बे मन से उठा और वापिस लौट आया, पता नही क्यों ऐसा लगा जैसे किसी अपने से मिल कर आया जो हमेशा वहीं रहेगा जब मन होगा फिर से चला जाऊंगा| कुदरत से प्रेम और कुदरत का प्रेम कितना हसीन है, इंसान के लफ्ज़ी शगूफों से कहीं दूर और परे|


जम्मू 

18 september

2023





Thursday, April 13, 2023

              The mind speaks 


In the cities every individual is behind the money, some are in the pursuit of earning, others are in the struggle to spend the earned one, some are trying to show off their wealth, some sit in the office and do paper work as part of their job, some wander in the streets to sell the things to earn the money to fulfill their needs.  

Drivers and conductors do overload to earn more, in the offices people demand money for work, in the religious institutions preachers ask for money for whatever purposes, relationships are maintained and broken because of the money, people salute you if you have money earned by whichever way. While commuting I see people who are destitute, beggars, wanderers, they are ignored in the fast-growing world as if they are not human beings. There is insecurity in everyone, everyone is alienated, strange and competitor. Even close relatives of yours are also a stranger to you, you do not have confidence to sit in front of them because you are afraid that they will judge you by your work, dress and outfit, social connections. 

These are our cities where no one looks at each other and smiles, unlike villages. But villages are also in the race to become urbanized and acculturated on the line of cities. People who have migrated to the cities think that they are superior to the village dwellers, and village dwellers live in an inferiority complex. There is natural beauty in the villages, but the villages have their own set of challenges. The caste system, ethnic differences, too much interference in personal life, petty enmities, jealousness, mental trauma of being a girl or boy, conservatism, narrow mindedness. The taunts and scolding of parents and extending families and much more.  

Amid all this you need a niche where you can live your life to the fullest, where you can recreate, observe, learn and apply. But the tyranny is that you are part of this society, and you must thrive here. The only viable option is to dissociate yourself from the world while being associated with it, observe, live and learn without becoming a part of this saga. How much of it is possible I don’t know.

                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...