Thursday, April 23, 2020


                                  तलाश




में भी तबीब हूँ ऐसा,
खुद ही मरज़ लगा कर,खुद ही दवा डूंडता हूँ |

खड़ा हूँ वहां जहाँ धुआं ही धुआं है
फिर घबरा के में वहां शमा डूंडता हूँ |

जब के मालूम है हकीकत उसके होने, न होंने की
फिर भी में  दुनियां की तरह हर जगह खुदा डूंडता हूँ|

जब के दुनियां की रीत है मतलब की इबादत करना
में अनजान बन कर यहाँ वफ़ा डूंडता हूँ |

में क्या शिकायत करू किसी की या सजा की दर्खावस्त करू
में तो हर बात में अपनी ही खता डूंडता हूँ |

इतीफाक है के में ही आजादी और में ही सजा चाहता हूँ
में अपनी आजादी में भी शायद सजा डूंडता हूँ|

फिर हुआ यू के मैं सोचते सोचते रुक सा गया
ख्याल सा आया के चल के कहीं अपना जहाँ डूंडता हूँ||

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Saturday, April 18, 2020


                                               काश ऐसा हो !!


एह काश ऐसा हो, के जब मैं दुनियाँ की कशमकश से थक जाऊं
तू आ कर सामने मेरे फूल सा मुस्कराया करे|


तेरी मासूमियत देख कर, तेरी मुस्कराहट देख कर
आंखू  में मेरी एक दरया सा मचल जाया करे|


देख कर मेरी बे-चेनी तू मुझे समझाया करे
तू मिल कर साथ मेरे मेरी उल्झानू सुलझाया करे |


ये कह कर के सब ठीक हो जाये गा न
तू मुझे फिर से चलने का भरोसा दिलाया करे |


फिर जब कभी में सेहम जाया  करू मुश्किलों को देख कर
तू मुझे दे कर दिलासा मेरी हिम्मत बडाया करे|


कभी अगर में भटक जाऊं रास्ते से या मुहं मोड़ लू सचाई से
तू घुस्से से चिला कर मुझे गलत होने का एहसास दिलाया करे |


में जानता हूँ के ये महज़ एक तसावर है मेरा, एक ख्याल सा है
काश ऐसा हो के ये ख्याल हकीक़त हो जाया करे |


फिर  सोचता हूँ के शायद ये खुदगरजी हो गी मेरी
ये भी तो गलत है न के तू मेरी खातिर परेशान हो जाया करे |

काश ऐसा हो के जब में दुनियाँ की कशमकश से थक जाऊं
तू आ कर सामने मेरे फूल सा मुस्कराया करे ||
                                                                                              शफीक -रुद्रप्रयाग

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Thursday, April 16, 2020


                                                 तराने



ये तराने ऐसे हैं के ना आएंगे समझ मैं तुम्हारी
क्यों पूछ पूछ के भला सर अपना खपाते हो| 
        
हम हैं के खुश हैं, बहुत कुछ खो कर भी
हमदर्दी के नाम पर तुम क्यों आंसू बहाते हो |

क्या तुम ने मुझे देखा है कभी आँसू बहाते हुए, शिकायत करते हुए
अब जब में चुप हूँ तो क्यों पुरानी कहानियां सुनाते हो |

तुम्हें पता है वो आंखू से आँसू की नदियाँ बहना, वो आंखू का आ जाना
अब जब के आरजू है न तमना कोई, फिर क्यों सूखे पोधूं को पानी लगाते हो|

अब जाओ भी के मुझे हैं काम और बहुत सारे
तुम क्यों बार बार मेरा सबर का इम्तेहान लेने आ जाते हो|

बड़ी मुश्किल से मैं निशान मिटाता हूँ कदमों के तुम्हारे
फिर क्यूँ बार बार, बिन बुलाये तुम लौट आते हो|

ये तराने ऐसे हैं के न आएंगे समझ मैं तुम्हारी 
क्यूँ पूछ पूछ के भला  सर अपना खपाते हो ||

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                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...