ये बद-सलूकी बे सबब तो नही|
हम जाने-अनजाने पता नही क्या क्या कह जाते हैं या सोच लेते
हैं एक दुसरे के लिए, क्या क्या ख्याल बना लेते हैं, अक्सर जिसके बारे में सोचते
हैं उसको पता तक नही होता| मैं भी बहुत कुछ सोच लेता हूँ, लेकिन सोचने से पहले
देखता ज़रूर हूँ| कही बार ऐसा होता है की कोई इंसान कुछ भी कह कर निकल जाता है|
जैसे शकल देखि है तू ने अपनी, चुतिया है तू, गंद है तू, वघेरा वघेरा, मैं अक्सर इन चीज़ों को दर-गुज़र कर देता
हूँ, ये सोच कर की कहने वाला मुझे जानता ही कितना है, और वो मुझे देख या समझ ही
कहाँ पाता है, कहने वाला तो अपनी समझ से कहता है और ज़रूरी नही की उसकी समझ सही हो|
ये रोज़-मरा की ज़िन्दगी से सीखने की बातें हैं, की कोन कैसा
है और कोन कितना समझ सकता है| लोगों में बड़ा आम है दुसरे को बिना देखे सुने अपनी राय
रख देना, दो मिनट कह्का लगा कर हंसना और निकल जाना| शायद पड़ लिख कर हम ने इतना ही
सीखा है आजतक| खेर!
मैं अक्सर इन चीज़ों पे गहराई से सोचता हूँ की कोई इंसान
आखिर ऐसा कैसे कहता होगा, वो मुझ में क्या ऐसा देखता होगा की वो बदनुमा लफ्ज़ कह
देता होगा, वो बोलते वक़्त खुद को देखता भी होगा?, वो सोचता होगा? वो कहने के बाद reflect करता होगा? क्या वो ये जान पाता होगा
की उस बात का दुसरे व्यक्ति पे क्या असर पड़ेगा? शायद कहने वाला ऐसा कुछ भी नही
करता होगा, तभी तो वो गाली, या बुरा भला कह पाता है, देखने
और समझने वाला तो बुरे को भी बुरा कहने से पहले खुद से पूछता है की कहीं वो उसकी
ग़लतफहमी तो नही?
ऐसी कही बातें मुझे बेचैन करती हैं, मुझे क्या, किसी भी
सोचने समझने वाले इंसान को करती होंगी| फिर मैं देर तक खुद को शीशे में देखता हूँ,
वो देखता हूँ जो मैं हूँ, जैसा मैं हूँ, अपनी कमियों और खूबियों के साथ| चेहरे पे
शर्मिंदगी दिखती है और आँखों में सवाल लेकिन निराशा या बे-इज्ज़ती नही|
फिर सोचता हूँ की जो भी ये सब बोलता है वो अपनी समझ बोलता
है, मैं तो वो हूँ ही नही, बे-ईमान नही हूँ, झूट फरेब नही करता, किसी को तकलीफ नही
देता, किसी से नफरत नही करता, उंच नीच नही समझता, खुद पे शर्मिंदा हुआ रहता हूँ की
कितनी कमियाँ अब भी बाकी हैं मुझ में| बिना किसी सहारे सारे काम करना, अपने
अकेलेपन के साथ ख़ुशी खशी जीना, संघर्ष करना और कोई शिकायत नही करना, जिम्मेदारियां
इस क़दर निभाना की एहसास तक न हो| ये सब देख कर मैं लोगों की बातों पे हंसता हूँ,
और सोचता हूँ छोड़ न जाने दे| मगर कहने वाला भी तो किसी तकलीफ में है वरना भीतर से
शांत और ठहरा आदमी किसी की बुराई में अपना वक़्त क्यूँ देगा| या तकलीफ क्यूँ देगा|
ये सब मुझे सीखाता है की किसी की बातों पे विश्वास करने से
पहले, घुस्सा होने से पहले, निराश होने से पहले, बह जाने से पहले खुद को तो देख लो,
होसकता है कहने वाला गलत हो, क्यूंकि जितना तुम खुद को जानता है उतना वो जान ही
नही सकता, वो प्याज़ की बहरी छिल्की देख प्याज़ की quality परख रहा है| और अक्सर तो लोग देखते तक नही, देखना या देख पाना आसान कहाँ
होता है, किसी को तुम्हारे चेहरे की उदासी दिखती है, किसी को तुम्हारे पुराने कपड़े,
किसी को पसीने की बदबू, किसी को कमज़ोर शरीर, ये सब वो देख ही नही पाते जो असल में तुम
हो, तो फिर बातों पे नाराज़गी कैसी, परेशानी कैसी| बस इतना ध्यान रखते चलो की तुम
खुद को ना भूल जाओ, अगर भूल गये तो तुम भी ऐसे ही होजओगे, उन लोगों की तरह जो देख
तक नही सकते और आसमान का रंग बता देते हैं|
कहीं न कहीं हम सब सोये हैं, अनजान हैं, अज्ञात हैं, अपने
आप से ही अजनबी हैं, खुद को दूसरों की नज़र से देखते हैं, और उनके लिए खुद को बदलते
हैं या बदलने का नाटक करते हैं, इसी नाटक में जीवन तमाम होजाता है| कोई नींद से
जगाने की कोशिश करे तो उससे मार पीट करते हैं, नाराज़ होते हैं| हर दिन बनते और
मिटते हैं और जो हैं उसको भूल जाते हैं| यकीनन, मैं क्या हूँ ये मैं ही जानों तो
बेहतर वरना औरों से पूछता फिरोंगा की मैं कैसा हूँ और हर कोई अपनी अनदेखी-अनजानी
समझ बतायेगा और निकल जाएगा| जीवन में मरने से पहले एक भी बार होश में आ पायें तो
एहसास होगा की नींद से कहीं अच्छा है जागते रहना|
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