गुमनाम
गुमनाम सा एक शख्स था शहर में कोई,
न कोई खबर थी उस की, न अता-पता था कोई|
डूंडने की हज़ार कोशिशों पर भी वो न मिल पाता,
वो था तो सही, मगर हो कर भी ओझल सा था|
वो था कोई जो डूंडने पर न मिलता,
डूंडन छोड़ दो तो महसूस होता था उसके जैसा कोई|
यूँ मानो जैसे हवा सा था वो,
था भी और नहीं भी था, वो एहसास था जैसे कोई|
बुलाने पे आता न पुकारने पे बोलता था वो
चुप कर जाओ तो आसपास दिखता था उसके जैसा कोई|
खुली आँखों से देखने जाओ तो ओझल था वो
बंद आँखों से मगर दिखता था उसके जैसा कोई|
वो परे था दुनिया के सारे पैमानों से, सारे दायरों से|
जहाँ खत्म हूँ सारे पैमाने, जहां दायरे न थे, वहां दिखता था उसके जैसा कोई|
दुनिया की नज़र से देखना चाहा मैं ने तो बहुत धूर पाया खुद से उसको
आम नज़रों से दिख जाता, वो आम सा इंसान नहीं था कोई|
उसको देखना बस मुमकिन था सिर्फ अन्दर की निगाह से
वो हो कर भी गुमनाम था, नाम हो कर भी बे-नाम था कोई|
गुमनाम सा एक शख्स था शहर में कोई,
न कोई खबर थी उस की, न अता-पता था कोई|
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