Sunday, December 12, 2021

                                                      गुमनाम

गुमनाम सा एक शख्स था शहर में कोई,

न कोई खबर थी उस की, न अता-पता था कोई| 

डूंडने की हज़ार कोशिशों पर भी वो न मिल पाता, 

वो था तो सही, मगर हो कर भी ओझल सा था|

वो था कोई जो डूंडने पर न मिलता, 

डूंडन छोड़ दो तो महसूस होता था उसके जैसा कोई|


यूँ मानो जैसे हवा सा था वो,

था भी और नहीं भी था, वो एहसास था जैसे कोई|


बुलाने पे आता न पुकारने पे बोलता था वो

चुप कर जाओ तो आसपास दिखता था उसके जैसा कोई|


 खुली आँखों से देखने जाओ तो ओझल था वो 

 बंद आँखों से मगर दिखता था उसके जैसा कोई|


वो परे था दुनिया के सारे पैमानों से, सारे दायरों से|

जहाँ खत्म हूँ सारे पैमाने, जहां दायरे न थेवहां दिखता था उसके जैसा कोई| 


दुनिया की नज़र से देखना चाहा मैं ने तो बहुत धूर पाया खुद से उसको

आम नज़रों से दिख जाता, वो आम सा इंसान नहीं था कोई|


उसको देखना बस मुमकिन था सिर्फ अन्दर की निगाह से 

वो हो कर भी गुमनाम था, नाम हो कर भी बे-नाम था कोई|

                                

गुमनाम सा एक शख्स था शहर में कोई,

 न कोई खबर थी उस की, न अता-पता था कोई| 

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                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...