तलाश
में भी तबीब हूँ ऐसा,
खुद ही मरज़ लगा कर,खुद ही दवा डूंडता हूँ |
खड़ा हूँ वहां जहाँ धुआं ही धुआं है
फिर घबरा के में वहां शमा डूंडता हूँ |
जब के मालूम है हकीकत उसके होने, न होंने की
फिर भी में दुनियां की तरह हर जगह
खुदा डूंडता हूँ|
जब के दुनियां की रीत है मतलब की इबादत करना
में अनजान बन कर यहाँ वफ़ा डूंडता हूँ |
में क्या शिकायत करू किसी की या सजा की दर्खावस्त करू
में तो हर बात में अपनी ही खता डूंडता हूँ |
इतीफाक है के में ही आजादी और में ही सजा चाहता हूँ
में अपनी आजादी में भी शायद सजा डूंडता हूँ|
फिर हुआ यू के मैं सोचते सोचते रुक सा गया
ख्याल सा आया के चल के कहीं अपना जहाँ डूंडता हूँ||
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