एक आवाज़, एक सदा!
मना किया था ना ज्यादा
हंसने से
मना किया था ना हदें,
सरहदें लांगने से,
मना किया था ना अपनाने से, अपना
हो जाने से
मना
किया था ना किसी को खुद सा देखने से,
और भी बहुत कुछ करने से
मना किया था जो तुझे मालूम था, फ़िर भी दर-गुज़र किया था तू ने
अब जब सब कुछ साफ़ दीखता
है तो खुद पे हंसी भी और रोना भी क्यूँ कर आता है|
खुद को झुटलाने चला था
ना की तू यूं ही बोलता है, हर कोई एक सा नहीं होता, अब रोना क्यूँ मगर आता है रे,
शायद इसलिए की मैं सच कहता था|
हो जा ना एक बार फ़िर से!
अजनबी, अनजान, चुप जैसे
हो जंगल की खामोशी
मुस्कराया कर न जैसे
किसी अजनबी को देख कर मुस्कराया करता है, अंतिम सी पर खूबसूरत सी हंसी,
दर-गुज़र कर दिया कर ना
जो भी हो, एक नज़र देख कर,
ज़रूरत हो तो बिन-पूछे
कूद जाया कर ना, जैसे तू अनजान लोगों के लिए करता है
लौट जाया कर ना अगर कोई
झिड़क जाता है तो|
जान भूज कर अकेला चला
कर ना रास्तों पर जैसे तू हमेशा चला है,
अगर तकलीफ हो तो खुद को
बताया कर ना, जैसे तू आजतक बताता आया है|
क्या ज़रूरी है हर गलती
को गलत कहना,
छोड़ आया कर ना गलतियों
को भी और गलती करने वालों को भी उनके साथ|
अपनाया कर ना पेड़ पौधों
को, पहाडों को, प्रकृति के अलग अलग नजारों को, अनजान बच्चों को, जानवरों को, उन
इंसानों को जिनका कोई नही होता,
रिश्ते बनाया कर ना ऐसे
जिन में कोई लेन-देन का भोझ ना हो, जहां उम्मीदें ना हूं, उंच-नीच ना हूँ, मैं और
तुम ना हो, मेरा और तेरा ना हो|
मैं सच कहता हूँ दोस्त
तू अकेला बहुत अच्छा है, अकेला बहुत कुछ है
आज़ाद, खुश, खामोश, हमदर्द,
थोडा अनजान, और सबसे थोडा अलग|
फ़िर क्यूँ इस वक्ती,
दिखावे की दुनियाँ की आड़ में खुद को रुसवा करता फिरता है,
दुनियाँ जैसी है, लोग
जैसे हैं, वो तो हैं ही, तू देख कर, मुस्करा कर अपने घर लौट जाया कर|
सुन ले ना!
हो जा ना, एक बार फ़िर
से, अपने जैसा, खुद का, खामोश सा, ठहरा हुआ, मुसलसल बहता हुआ बिना आवाज़ के!
अन्दर की आवाज़.