एक नदी की कहानी (Tale of a River)- “an imagination turned reality”
बहती नदी को देख कर सब खुश होते हैं, सबको उस में जीवन नज़र
आता है, लोग चलते चलते ठहर कर उसके बहाव को देखते हैं| नदी बस बहती है मुसलसल,अपने
साथ बेशुमार चीज़ें लिए हुए काफिले में, उसके किनारे हरी हरी घास उगी दिखती है, पेड़
पौधे, चरिंद-परिन्द सब पनपते हैं| नदी
उनके लिए है और वो नदी के लिए, कोई बंदिश का रिश्ता नही, परिंदों का मन हुआ तो वो
कल उड़ जायेंगे और नदी अपनी रफ़्तार में बहती रहेगी| कल और परिंदे, जीवन आएगा, पनपे
गा और निकल जायेगा| ये सब होता है नदी के किनारे मगर वो मगन है अपने बहाव में,
अपने अंदाज़ से चलती है| यही एक नदी की पहचान हुआ करती है| शांत, लगातार चलती हुई,
कोई आये या न आये या रुक जाए मगर उसका बहाव नही रुकता|
फिर किसी महान इंसान का गुज़र होता है उसके किनारे से, वो
इंसान नदी को देख कर वही का होजाना चाहता है, उससे वो सब अच्छा लगने लगता है| खेर!
इंसान है तो अपने बारे में पहले सोचता है, तो वो उस नदी से रिश्ता जोड़ लेता है,
उसके कनारे बस जाता है, कुछ पेड़ पौधे, फल फूल, और कुछ खयाली मकान भी तामीर कर लेता
है, वो इंसान न जाने क्या क्या करता है, कभी नदी में कूद जाता है, कभी उसका बहाव
रोकता है, कभी पानी इधर उधर उछालता है, कभी दुसरे परिंदों को उसकी बातें बता कर
मज़ाक उड़ाता है, और भी नजाने क्या क्या|
नदी ये सब खामोश होकर, चुपचाप देखती जाती है, कभी मुस्करा
कर तो कभी हेरान होकर उसकी हरकतों को नज़र अंदाज़ करती जाती है, शायद नदी को इल्म
होता है की ये चंद दिनों के नगमे हैं जो गाता है उससे गाने दीजिये| नदी को भी उस
इन्सान का वहां होना अच्छा लगता मगर वो ये ज़रूर जानती की ये सब वक्ती है|
वक़्त गुज़रता गया, मौसम बदलते गए, नदी वक़्त के साथ और गहरी
होगयी और उस इंसान के लगाए पेड़ पौधे भी बड़े होगये| सब कुछ इतना सरल था की उस इंसान
और नदी में कोई फरक ही न था, सब कुछ साफ़ पानी के जैसे पारदर्शी था, जो था वो सामने
था, गलत या सही सब सवीकार था| कभी कभी तो यूँ लगता की सब इस्सी तरह रहने लगें तो
दुनियाँ कितनी खूबसूरत जगह होजाए| मगर वक़्त के पास कुच्छ और ही था|
गुज़रते वक़्त के साथ सब बदलने लगा, मानो जैसे इंसान सब कुछ
अलग नज़र से देखने लगा, इंसान को उसका मैं ज्यादा अच्छा लगने लगा, हर चीज़ का हिसाब
रखने लगा, हर चीज़ को पैसे से तोलने लगा मानो जैसे पैसे से सब खरीद सकता है इंसान,
बहुत जल्दी बहस इस बात पे होने लगी की तुमने क्या किया आजतक मेरे लिए, इंसान हरेक काम
गिनवाने लगा, नदी हेरान थी लेकिन शांत भी थी क्यूंकि एक दिन तो ये होना ही था|
फिर हर चीज़ में कमी दिखने लगी, वही पानी जो कभी इंसान को
एकदम साफ़ दीखता था अब उस में गंदगी दिखने लगी, अब उसको हर चीज़ बे-मतलब लगने लगी,
जैसे बुढापे में माँ-बाप फालतू की चीज़ें लगने लगते हैं लोगों को| हर चीज़ का हिसाब
किताब करने लगा था इंसान| नजाने अपने ही मन में क्या क्या बनाये बेठा था, इस बात
की खबर किसको थी|
बिल-आखिर एक दिन उसने फैसला कर लिया की बेकार है ये सब, अब
यहाँ से कूच किया जाए, आज़ाद तो वो था ही, और न ही कोई रूकावट थी उसको, वो अपना
फैसला कर किनारे हो लिया| उसको हरेक चीज़ बेमतलब और बेकार लगने लगी थी उस नदी की अब|
फिर वो अपनी ही तस्सली के लिए दूसरों से शिकायत भी करता रहा, और वो अपनी राह
निकलने लगा|
वो मिटटी के घर, रेत के मीनार जो वो बनाया करता था शायद वो
उन्हें तोड़ आया, वो पेड़ पौधे, वो नोक-झोंक, वो बेशुमार बातें उन सब को वो व्ही छोड़
आया या मसल आया| उससे लगता है वो पैसे से सब खरीद ले गा, क्यूँ नही दुनियाँ में हर
चीज़ पैसे से जो मिल जाया करती है|
बहुत सोचने के बाद फिर उस इंसान से एकबार मिलना हुआ, बड़ी मुश्किल
से कुछ बातें हो पायी, मगर यकीनन सब कुछ बहुत अलग लगा, उस इंसान की आँखों में साफ़
दिखती वो नफरत, और वो अंदाज़ ऐ गुफ्तगू, मानो जैसे सदियों पुराने दुश्मन हूँ||
इंसान महान कहता है खुद को, शायद इसीलिए क्यूंकि वो बहुत से
रूप ले सकता है ज़रोरतें बदल जाने पर, अलग अलग किरदार निभा सकता है| ये होगा ये पता
था मुझे पर सच में होजायेगा इसका यकीन अब आया|
नदी बहती थी, बह रही है, उस रवानी, उसी अंदाज़ के संग| बस
हेरान है की अच्छा हुआ जो कभी किसी को सौंपा नही खुद को| वरना आज गिडगिडा कर भी
अगर रोती तो भी इंसान उन आंसू को बहानेबाजी का नाम दे देता| और कह देता इसी तरह की
तुम से कोई रिश्ता थोड़ी है हमारा, हम तो यूँ ही आये थे हाल चाल देखने को|
सब गलत होते हैं, सब अच्छे भी होते हैं, मगर कभी कभी हम दूसरों
को गलत ठहराते हैं अपनी तस्सली की खातिर| चार दिन की इस ज़िन्दगी में भी इंसान को
लगता है की वो होशियार है| और पैसे से सब कुछ खरीद सकता है| किसी का वक़्त, जज़्बात,
.................मगर शायद कुछ चीज़ें हैं जो न बिकती हैं और न कोई कीमत लगा सकता
है उनकी, जैसे वक़्त, दुनियाँ की कोई बी दोलत वक़्त नही खरीद सकती और न ही वापिस दे
सकती है, मगर शायद इंसान इससे समझने में दिलचस्पी ही नही रखता|
नही पता होता की हर किसी को की इंसान कितना चालाक होसकता है,
शायद इसकी कभी ज़रूरत ही न पड़ी थी, और न ही होने की तमन्ना है|
(this text can be
seen as an imagination of author, it may have nothing to do with anyone in
person)
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