कितना अजीब सा है ये सब, कुछ ख्यालात और फिर तसवारों की एक
लम्बी सी कतार, किस क़दर हलचल और झुनझुनाहट पैदा करते हैं ये खयालात| और इस सबके
होने के लिए बस एक ख्याल भर काफी है, ये कितना अजीब मामला है| अक्सर में इससे समझ
नही पाता, बता नही पाता, मगर महसूस करता हूँ|
जिस चीज़ से तुम्हारा कोई सीधा वास्ता तक नही, उसकी हकीकत
पता तक नही, कुछ अधूरी बातें हैं बस जानकारी के नाम पर, व्ही चीज़ तुम्हें इतना
हिला क्यूँ देती है? यूँ महसूस होता है की कोई डर है जिसने मेरे ही अन्दर घर कर
लिया है, और वो डर बे-बुनियाद है, बनावटी है|
शायद कहीं सारे ऐसे सच हैं, जिनकी सचाई पे मुझे शक सा है,
और में उन्हें सच माने बेठा हूँ, जब भी वो सच, झूट से लगने लगते हैं तो मैं डर
जाता हूँ| अब तक जो माना था वो कहीं गलत हुआ तो? यही कारण है इस सब के होने का|
मेरे मानने से भला क्या होगा, जो है सो है, गलत हो या सही,
है तो है, मुझे ये मान के चलना होगा की कुछ भी सत्य तब तक नही है जबतक मैं खुद
उसकी सचाई को नही जानता| और अगर कुछ है तो होने दो, इससे भला रोका तो नही जा सकता|
हर किसी का अपना एक नजरिया होता है, कुछ लोग वक़्त के हिसाब से खुद को बदल लेते हैं,
जहाँ फाईदा दिखे उधर हो लेते हैं, और कुछ असूलों पे चलते हैं चाहे हालात जैसे भी
रहें, अब देखा जाए तो अपनी अपनी जगह दोनों ही सही हैं|
इसलिए कुछ सच थोड़ी देर के लिए सच होते हैं, उन्हें तभी तक
मानना चाहिए| सिर्फ आजतक, कल को कल पे छोड़ देना ही अच्छा फैसला है| ये जज़्बा की “कुछ
भी होसकता है” आपको हर अनहोनी के लिए तयार रखता है, जीवन हो या जीवन के साथ चलते
रिश्ते, इनका होना बस आज तक ही महदूद है, कल के लिए बस उमीदें हैं और हर बार
उमीदें -उमीदें नही निकलती|
No comments:
Post a Comment