ye jo insaan hai na!!!!??
जोड़ना मुश्किल होता है और बहुत आसान होता है तोड़ देना, बनाना
कठिन होता है और बहुत आसान सा काम है मिटा देना, उठाने से कही गुण आसान है गिरा
देना, भुला देना भी आसान है मगर याद रखना जरा कठिन है| ये सब चीज़ें इंसान के
रिश्तों से लेकर दुनियाँ की बाकी चीज़ों पर भी लागु होती हैं|
घूम फिर कर हम इंसान बस मतलब के पुजारी हैं, मतलब के लिए
मिलते जुलते हैं, बातें बनाते हैं और नजाने क्या क्या| मैं अक्सर हेरान होता हूँ
की ये इंसान भी कितना होशियार और हुनरमंद चीज़ है,
कितने चेहरे बदलता है ये ज़रूरत के हिसाब से, कभी इतना
हमदर्द की जैसे उस में और आप में कोई अंतर ही न हो, और कभी इस क़दर अनजान और नफरत
से भरा हुआ की जैसे कोई पहचान ही न हो, कभी इतना नज़दीक की कोई दूरी ही न हो और कभी
इतना धूर की उस तक पहुंचना तसवर से परे होजाए|
वो कहता था की कठिन हैं रिश्ते निभाना, कठिन होता है
रिश्तों को डोर को टूटने से बचाए रखना, मतलब के लिए तो इंसान कुछ भी कर जाये, आसान
नही होता बे-मतलब कुछ किये जाना, वो सच कहता था| सच में कठिन है, यहाँ scholars असफल होजाते हैं बड़े बड़े|
अजीब जीव देखा है इंसान भी, ये बड़ा ही हुनरमंद और होशियार
है, ये एक ही वक़्त में दोस्त भी है और दुश्मन भी, एक ही वक़्त में अपना भी है और
बेगाना भी, इंसान भी है और हैवान भी, अपना मतलब निकलता रहे तो प्रेम भी दिखाता है
और न हो तो नफरत में कमी नही छोड़ता| कितने चेहरे लिए घूमता है ये इंसान अपने गरूर
और घमंड को सर पे उठाये हुए, अपने ही अन्दर लालच के दीप जलाए हुए| कभी रुक कर ये
क्यूँ नही सोचता की इस नफरत, इस घमंड, इस एह्न्कार का मतलब क्या है? मगर नही|
बातें बनाना तो बड़ा आसान है, सब कोई बना लेता है मगर उन
बातों पे चल कितने पाते हैं ये सवाल है| खेर! आज के इस बदलते दौर में ज़रूरतें
बदलते देर कहाँ लगती है, और फिर विकल्प भी तो अनेक हैं, मगर इस दोड़ में इंसान
इंसानियत से और अपने असलीपन से कितना दूर हो गया है ये कौन सोचता है|
अब समझ आता है की जानवर बन कर जीना कितना आसान काम है, बस
खाने और जीने की खातिर जिए जाना, और सो जाना, मगर इंसान बन कर जीना ये बात कुछ और
ही है, लम्बा सफ़र है जानवर से इंसान बन जाने का|
आजकल सोचता हूँ की दोहरेपन की इस सांगत में, कहीं मैं भी
ऐसा ही न हो जाओं, खेर| मुझे ज़रूरतों ने आजतक नही बदला तो अब क्या बदलेंगी| फिर
सोचता हूँ की बातें तब भी बातें थी और आज भी हैं, कुछ असल में होता तो बात थी| लोग
गलत सही को नही अपने फयिदे नुकसान को देखते हैं और हम भी उन्ही लोगों में जीते
बसते हैं|
ज़रूरी है की मैं ये सब कुछ हंसी में उड़ा दिया करों और मज़ाक
समझ कर भुला दिया करों, नजरें झुका के निकल जाया करों, सब कुछ मानता गया तो नज़रें
मिलाना तक नामुमकिन होगा|
सच और घमंड की लड़ाई में अक्सर घमंड ही जीत हासिल करता है,
और सच तो सच है उससे किसी जीत की ज़रुरत कहाँ होती है, घमंड बेबुनियाद है इसलिए
तडपता मचलता है और सच ठहरा है पहाड़ की तरह|
जो है उससे चलने दो, बस देखते रहो दूर से, ये सब एक कला, एक
नाटक है, कभी कोई करदार तो कभी कोई, कभी कोई रूप तो कभी कोई, मगर जो होता है उससे
होने देना चाहिए और देखते रहना चाहिए जबतक ये खेल चलता रहे, यही दुनियाँ है बस रूप
अलग अलग हैं|
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