मेरी पहचान क्या हो? और मैं कौन हूँ?
मैं
दुनियाँ को, जो की बहुत से खांचो में बटी हुई है को देख अक्सर हैरान रहता हूँ की
मैं आखिर कौन हूँ और खुद को क्या मानों| लोगों को, मजहबों को, रिवाजों को, फलसफों
को बड़े गोर से पड़ता और देखता, परखता हूँ| मैं खुद को किसी खांचे में डाल ही नही
पाता, वैसे तो चलन के मुताबिक हम बहुत सी पहचानें लिए घुमते हैं, जिस घर में पैदा
हुए, वही धर्म हमारा हो जाता है, वही ज़ात होजाती है, और भी बहुत कुछ|
मैं
सोच कर देखता हूँ की अगर मैं एक धर्म को मानता हूँ तो वो मुझे एक अलग पहचान दे
देता है, जैसा मुस्लिम होता हु तो हिन्दू से अलग होजाता हूँ, सिख होता हूँ तो इसाई
से अलग होजाता हूँ| फिर सोचता हूँ सब धरम मान लूँ लेकिन वो भी नही हो पाता, क्यू
की बहुत सारी बातें जो धर्म बताते और प्रचार करते हैं मैं उनमे न ही यकीन रखता हूँ
न ही इतेफाक| तो ये करना दोगलापन होजायेगा| मैं ने बहुत लोग देखे हैं जो धर्म को
बिना समझे खुद को नास्तिक कहने लगते हैं, लेकिन मुझे नास्तिकता भी किसी धर्म से कम
नहीलगती| वो भी तो एक मानना ही हुआ, फरक इतना है की उनको विश्वास है की भगवान् नही
होता और धार्मिक लोग मानते हैं की भगवान् होता है| इस में आस्था और नास्तिकता की
लड़ाई है| मुझे इसका हिस्सा नही बनना|
सच
कहूं तो मुझे ऐसी कोई भी पहचान चाहिए न ज़रुरत है जो इंसान ने खुद बनाई हो और जिसके
लिए इंसान एक दुसरे से लड़ते हूँ, बंदशें और बंधन लगाते हूँ , हर चीज़ को बाँटते
रहते हैं और अपने ही जैसे इंसान को अपना दुश्मन मानते हैं| मुझे ऐसी कोई भी पहचान
नही चाहिए जो मुझे किसी ने दी हो| जो मुझे अपने ही जैसे इंसानों से अलग कर दे|
मुझे
अंदाजा है जिस समाज में मैं रहता हूँ, वहाँ बहुत diversity
है, जीवन के तरीके में, सोच में,
खान पान में, पहनावे में, ideology
में| मैं आज भी इन सब चीज़ों को क़दर और इज्ज़त करता हूँ और हमेशा करते रहना चाहता
हूँ, मैं ये मानता हूँ की हर इंसान को आजादी है सोचने की,
मानने की,
अपने तरीके से जीने की, पहनने की, सब आजादी होनी चाहिए|
मैं
सोचता हूँ और चाहता हूँ की मेरी बस ये पहचान हो की मैं एक इंसान हूँ , और एक जीव
हूँ, ये पहचानें मुझे कुदरत ने दी हैं , जैसे एक पेड़ की पहचान है, एक परिंदे की
पहचान है| हाँ, क्युंकी मैं इसी दुनियाँ में रहता हु इसलिए जहाँ में रहता हूँ उस
जगह से एक अलग सा लगाओ है मुझे, जो की सब को होता है और होना भी चाहिए| मुझे अपने वतन से बे-हद लगाओ
है, इसलिए मैं अपने आपको इस धरती और इस धरती पे जो कुछ भी है उसके साथ जुड़ा हुआ पाता
हूँ| साथ ही मैं और दुनियाँ के देशों का
और वहां रहने वाले लोगों का भी उतना ही सम्मान करता हूँ| सही वतन परस्ती व्ही हुआ
करती है जिस में आप अपने वतन के साथ साथ दूसरों के वतन का भी सम्मान करो|
अब
तक एक बात समझ आती है की अगर हम इंसानी निर्मित पहचानों को समझ कर छोड़ दें तो धरती
कितनी अमन और खुश-हाल जगह बन जाए| फिर क्यूँ हिन्दू, मुस्लिम से और इसाई, यहूदी से
नफरत करे, क्यूँ लोग ज़ात-पात के नाम पर एक दुसरे में फरक किया करें| सच कहों, मुझे
खुद को इन सब से अलग हो कर बहुत हल्का महसूस होता है, मैं अपने आपको nature
के और इंसानों के और ज्यादा करीब पाता हूँ, कोई फरक या मेरा-तेरा नही दीखता, किसी
का भी दर्द या तकलीफ अपना लगता है| मुझे ख्याल आता है की कैसे बिना नाम पता जाने
कितने ही लोग हैं जो मुझसे हंस मुस्करा कर बात करते हैं, रास्ते में कितने ही बच्चे
hello
बोलते हैं हर रोज़ और खूबसूरती से मुस्कराते हैं, शायद जब हम मुखोटे उतार कर जीने
लगते हैं तो खुद में और universe
में कोई अंतर नही समझते| यही तो इंसान जागता है और खुद को समझने की यात्रा शुरू
करता है बिना किसी गुरु,
प्रभु या सहारे के|
कभी
मौक़ा मिले तो ज़रूर खुद के साथ ये तजुर्बा कीजिये, हर उस पहचान से कुछ वक़्त के लिए
अलग हो कर देखिये जो आपको कहीं और से मिली है, जो आपकी अपनी नही है| और तब अपने ही
आईने में खुद को देखना, की आप असल में क्या हो और क्या बना दिए गये हो या बन गये
हो|
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