Sunday, May 16, 2021

 

वक़्त-“The time”

 

मैं अक्सर देखता हूँ की सेकंड की सुईं घूमती है, फिर मिनटों की घूमती है और फिर घंटा गुज़र जाता है| घंटे गुज़रते हैं तो पहर गुज़र जाते हैं, मैं बहुत कुछ कर ही नही पाता, बहुत कुछ छूट जाता है मेरा, कितनी किताबें हैं जो मेरी शकल तकती रहती हैं, आधी पड़ी हुई,में उनको दिलासा देकर बोलता हूँ की कोई नही एकदिन साथ ज़रूर बैठेंगे| मगर दुनियाँ भर के काम, ये मेल, वो session, वो रिपोर्ट, फिर रूटीन की अपनी पढाई, और भी बहुत कुछ छोटा मोटा| इस सब में कब दिन निकल जाता है पता ही नही लगता, बहुत दिन बाद पिछले हफ्ते एक सपना आया तो मैं खुश होगया की चलो इतनी फुर्सत तो मिली|

इसी शश-ओ-पंज, इसी जध-ओ-जेध में मैं बहुत कुछ भूल जैसे जाता हूँ, हफ्ते हो जाते हैं में चंद दोस्तों से बात नही कर पाता, फिर उनकी बातें सुनता हूँ, उनका घुस्सा भी तो जायज़ है ना! हाँ एक ख्याल है जो मुझे अक्सर आता रहता है जिसके लिए मुझे वक़्त निकालने की ज़रुरत नही पड़ती|

इस सब के बीच ज़िन्दगी कभी कभी सवाल पूछती है की “मैं कहाँ हूँ” , वो रू-बरु हो कर ये सवाल पूछती है तो मैं वजाहत नही दे पाता, यकीनन जो मैं रोज़-मरा की ज़िन्दगी में करता हूँ वो करना तो शायद ज़रूरी है पर ज़िन्दगी........... ये सवाल, ये गिले शिकवे वाजिब हैं शायद, पर इतना सा वक़्त और काम बहुत से|

 प्यारा था न बचपन, इतना कुछ करके भी, 64 किलोमीटर धूर कॉलेज जा कर भी, घर के काम कर के भी, साथियों से बातें करके भी, सो कर भी, सपने देख कर भी, इतना सारा वक़्त बच जाया करता था और फिर खिड़की से बहार कभी बरफ से ढके पहाड़ और कभी नीले असमान को देखता था|

इतनी कुवत थी की हर दिन अपनी प्यारी बहन से लड़ता था, उसके दस दस नाम रखता था, टोकरी से रोटी चुराता था, कुछ बर्तन बिना धुले छोड़ देता था की वो घुस्सा और शिकायत करे| आज उससे देखे हुए और बात किये हुए दिन गुज़र जाते हैं, कितने बे-असर से होगये हैं रिश्ते!

हाँ माँ और पापा जो हर दिन बात करते हैं ऐसा लगता है जैसे मेरे साथ ही रहते हैं, और एक नमूना ज़िन्दगी में और है जो जब तक तंग न कर ले खाना नही पचता उसको| ज़िन्दगी के सवाल अच्छे हैं, अब उसकी सुनी जाए|

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