क्या किये जा रहा
हूँ मैं
है मोहब्बत की नहीं, इस पे तो है
सवालिया निशाँ अब
हाँ मगर, रिश्ता बा-खूबी निभा रहा
हूँ मैं|
मंजिल अब भी वहीँ है या फिर है ब्रह्म
मेरा,
हाँ मगर, रुका नही हूँ मैं, मुसलसल
चले जा रहा हूँ मैं|
कुछ चीज़ें हैं जो साफ़ नज़र आती हैं
मुझे न होती हुई
मैं सफ़र में हूँ न!बस दर-गुज़र किये
जा रहा हूँ मैं|
कभी मैं रुक कर खुद से सवाल पूछ
लेता हूँ, की कहाँ जा रहा हूँ मैं?
जवाब मिलता है की, मैं ने ही चुना
था ये रास्ता, तभी तो इस पे चले जा रहा हूँ मैं|
हाँ! ये अच्छा है की तुम गलतियाँ
करों ज़िन्दगी में,
मगर मैं गलातियूं से सीखता भी हूँ
और फिर से गलतियाँ किये जा रहा हूँ मैं|
हाँ ज़रूरी है उम्मीद और विश्वास,
मगर हकीकत भी तो कोई चीज़ है,
जैसे रेगस्तान में बो कर कुछ,
बारिश की आरजू-पुकार लगाये जा रहा हूँ मैं|
मैं भी कैसा इंसान हूँ न, समझ ही
नही आता मुझे ये अंदाज़ मेरा
वो परिंदा जो उड़ना ही नही चाहता,
उसी को पिंजरा तोड़ने की तरकीबें दिए जा रहा हूँ मैं|
ये जीत भी कोई अजीब सी जिद है मेरी
इसी जीत की खातिर मैं बार बार हारता
चले जा रहा हूँ|
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