एह्सासन-एहसास-ओ-फरयाद
लग भग 25 साल के जीवन में ऐसे कुछ ही मौके पेश आये हैं जब तबियत
यकीनन बहुत बिगड़ी है| शायद 3 या 4 ऐसे मौके हैं जो मुझे ठीक वैसे ही याद हैं जैसे
किसी को किसी नयी जगह की पहली यादें याद रहती हैं| पहली बार चौथी क्लास में था जब मेरी हालत काफी
बिगड़ गयी थी, घर वालों ने जितना कुछ था सारा किसी ज़रूरतमंद को दे देने का फैसला
किया था, अगर मैं ठीक हो गया तो|
तब तक मेरे साथ घर वालों के साथ साथ कोई ऐसा भी था जिसकी
जान मुझ में बस्ती थी, मेरा प्यारा, मासूम सा, और अनमोल सा दोस्त, जिस ने यहाँ तक मन्नतें
मानी थीं की मैं ठीक हो जाओं, चाहे मेरे बदले उस की जान चली जाए| और वही ज़ालिम साल
था जब वो मुझ से हमेशा के लिए धूर चला गया था, मुझे ये सोच कर रोना आता था की कहीं
उसकी दुआ खुदा ने सुन तो नही ली| तब से मेरा और खुदा का मनो जैसे कोई रिश्ता ही न
रहा था|
उसके वो मखमली हाथ मुझे आज भी महसूस होते हैं, जिनसे वो
मेरे चेहरे से पसीना पूछता था, और अपना मुख मेरे मुहं से लगा के कहता था की, ऐसा
करने से दर्द बट जाता है|
एक बार कॉलेज के समय भी बारिश पड़ने से कुछ दिन बेमार रहा था
मैं, तब दोस्त का काम माँ ने किया था, माँ! जो दुनियाँ की सबसे खूबसूरत और अनमोल
चीज़ है, जो सब से ऊंचा रिश्ता है, ऐसी जगह है माँ, की जब दुनियाँ में अगर कहीं भी
कोई रास्ता न मिले तो भी यहाँ आशियाना और सहारा मिल जाता है|
पता नही, लेकिन माँ की गोद में सर हो और उसके हाथ आपके माथे
पर हूँ तो इंसान बड़े से बड़ा दर्द सह लेता है| कौन कितनी फ़िक्र करता है इससे शायद
रिश्तों की गहराई को मापना सही नही हो गा लेकिन कुछ लोग और कुछ रिश्ते ऐसे होते
हैं जिन में जैसे जिस्म और सांस का रिश्ता होता है| खेर! अब ये सब बोलने में ज़रा
ज्यादा अच्छा लगता है, क्यूँ की अब लोग पढ़ -लिख गये हैं और अपने आप में जीने में
विश्वास रखते हैं, जो की एक अछि चीज़ भी है|
आजकल का दौर-ऐ-ज़िन्दगी भी मुझे एक अलग से मर्हाले में ले
आया है, एक ऐसी लड़ाई से लड़ना पड़ा है जिसके साथ मेरे ही जैसे बहुत से इंसान लड़ रहे
हैं, कुछ हार जा रहे हैं और कुछ जीत| दो तीन दिन से कभी सोचता हूँ की इस वक़्त तो न
दोस्त है, न माँ साथ है, उनको तो खबर भी नही है, फिर भी मैं बराबर चले जा रहा हूँ,
न खोफ है, न डर है, हाँ एहतियात बहुत कर रहा हूँ, खुद ही खुद का साथी, दोस्त, माँ, डॉक्टर बना हुआ हूँ| शायद अब
मैं बड़ा हो गया हूँ, जो की अछि बात भी है|
यू ही उसका ख्याल आया और माँ का भी, की वो पास होते तो क्या
होता, वो होता आज तो ज़रूर कहता “की साथी
चलो इससे आधा-आधा बाँट लेते हैं ना”, मगर मैं उसको डांट कर बोलता की धूर रहो मुझसे,
वो नाराज़ होता मगर समझ भी जाता की मैं उसकी भलाई के लिए ही उससे धूर रख रहा हूँ|
फिलहाल सोच रहा हूँ, मैं जल्द जीत जाओं और फिर दूसरों के
काम बी आना है “बाल मित्र” बन कर, कौन जाने कल क्या खबर आये, हालात नाज़ुक हैं जहां
के| हम तारिख-इतेहास जो लिख रहे हैं, बताने को किस्से होने चाहिए मगर अच्छे|
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