सरलता
सब
से मुश्किल काम है दुनियाँ में सरल या आसान होना, इतना सरल की कोई तुम्हें देखते
ही पहचान जाए की तुम क्या हो, क्या सोचते हो| सरल इतना हो इंसान को किसी दुसरे को
कोई बात पूछने से पहले कहीं बार सोचना न पड़े, किसी को काँधे पे सर रखने में
हिचकिचाहट महसूस न हो, किसी को हाथ का सहारा लेते वक़्त सोचना न पड़े| ऐसा हो
तुम्हारा बर्ताव के कोई अजनबी भी देख कर मुस्कराने लग जाए| सफ़र में चलते हुए किसी
को तुम्हारा नाम या ज़ात पूछ कर बात न करनी पड़े| न हो कोई पहचान तुम्हारी और न हो कोई तम्घा जो
तुम्हें एक आम इंसान से अलग करता हो|
कहीं
भी रहो या जाओ हवा और पानी की तरह घुल मिल जाया करो, न रहो किसी विचारधारा से इतने
चिपके हुए की कोई उस पे सवाल उठाये और तुम सवाल सह न सको| सोचो ना, अगर हम किसी
ख्याल से चिपकें ही न तो सारे फितने, सारे झगडे ही खत्म हो जाएँ, फिर तुम्हें न
मंदिर और मस्जिद के होने न होने से फर्क पड़े न किसी के हिन्दू या मुस्लमान या चौधरी-खान
होने से|
खेर
मुश्किल है सादगी इख्तियार करना, सादा होना| मगर कोशिश ज़रूर करनी चाहिए की जितना
होसके खुद को सरल बनाते चलो, धीरे धीरे सब कुछ अपना सा लगने लगे गा|
कभी
सोचना की हम कितने पेचीदा हैं, बाज़ार में कुछ, घर में कुछ, दोस्त के साथ कुछ और,
दफ्तर में कुछ और, महफ़िल में कुछ और, तन्हाई में कुछ और| कमबख्त कितने ही चेहरे
पहने घुमते हैं हम, और फिर यही सब हमें हकीकत लगने लग जाता है वक्त से साथ| सोचो न,
ज़िन्दगी इसी शश-ओ-पंज में कट जाती है की किसके सामने कौन सा चेहरा पहन के पेश होना
है| पति-पत्नी के लिए अलग चेहरा, माँ -बाप के लिए अलग, दुनियाँ के लिए अलग| ये सब
नाटक करते करते हम अपना असलीपन तो भूल ही जाते हैं|
सरल
होने का मतलब है जैसे तुम हो वैसा ही रहना, पोलिश या पेंट लगा कर नही| होश में
रहना न की हर किसी के इस्तेमाल की चीज़ बन जाना|
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सरल बिल्कुल सरल
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