कुछ बातें और सवाल|
यूँ तो बहुत कम देखता हूँ
मैं पीछे मुड़ कर, मुझे माजी में झांकना अच्छा नही लगता, हाँ याद सब कुछ है बस मैं
उस सब को फरोलता-टटोलता नही हूँ| मगर कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो मुझे खींच अतीत
में ले जाते हैं, और फिर में पुरानी किताबें जो राखी हैं मैं ने संभाल कर उन्हें
एक नज़र खोल के देख लेता हूँ| किताबें बहुत बता और याद करा देती हैं मुझे|
आज यूँ ही कुछ किताबों के
पन्ने पलटे और फिर बहुत सी बातें याद आई, उन बातों के संग कुछ सवाल भी आये मेरे मन
में, जिनके जवाब मैं नहीं दे पाया खुद को|
ये अजीब ही होता है न!
की जब दोस्ती, मोहब्बत या
ज़िन्दगी का सफ़र शुरू होता है तो एक अलग ही लगन, तड़प, उम्मंग, उम्मीद, आशाएं, होती हैं, नींद ही नही आती, थकान
नही रहती, कल का या किसी का डर नही रहता, अजीब सा जज्बा होता है वो| हमसफ़र बन कर साथ साथ चलने का, ख़ुशी-मुश्किल
में साथ देने का, अपना सब कुछ लुटा देने का एक दुसरे के लिए| सब कुछ कितना हसीं और
खूबसूरत लगता है, रास्ते, पहाड़, नदी, दुसरे इंसान, सब कुछ,
अच्छा लगने लगता है| चेहरे पे अक्सर एक अनमोल मगर खामोश सी हंसी रहती है| कोई अपना
-पराया नही लगता तब| इंसान जिंदा सा हो जाता है, उर्जा से भरा रहता है| सारी
सरहदें, दीवारें, सारे अंतर भूल जाता है| तू और मैं कहीं घुल कर “हम” हो जाता है|
लेकिन वक़्त के साथ कहाँ चला
जाता है ये सब? कहाँ चला जाता है आपका जज्बा, हिम्मत, हौंसला? वो तड़प, वो लगन, वो
कभी न पूरा होना वाला इंतज़ार कहाँ चला जाता है? क्यूँ थक कर आधे रास्ते से लौट
जाते हैं लोग? व्ही इंसान जो कभी आँखों का नूर हुआ करता था वो भोझ कैसे बन जाता है?
हम परखने क्यूँ लग जाते हैं एक दुसरे को, कमियाँ क्यूँ निकालने लग जाते हैं? हमें
कैसे किसी के होने न होने से फरक पड़ना बंद हो जाता है? कैसे हम किसी और का हाथ थाम
कर रास्ता बदल लेते हैं? ये कैसी दोस्ती या मोहब्बत होती है जो फ़र्ज़ और मजबूरी के
आगे झुक कर हार जाती है? कैसे हम फर्जी इज़त बचाते बचाते कितनी जिंदगियां बर्बाद कर
देते हैं? तुम और मैं, तेरा और मेरा,कहाँ से आ जाता है? मज़हब, ज़ात, पंथ, छेत्र, ये
सब देवार क्यूँ कड़ी कर देते हैं?
ऐसे कहीं सवाल थे जो मुझ से
पूछे गये और जवाब नही दे पाया, शायद अपना ही कुछ याद आया और मैं इन सवालों में उलझ
गया| मगर तुम्हें वक़्त हो तो सोचना ज़रूर और मैं तो सोचता ही हूँ|
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