क्या कीजिये!
सोचा था एक भरोसा काफी है ज़िन्दगी भर के लिए
अगर भरोसा ही न रहे तो भला क्या कीजिये|
सोचता था की हर एक याद को फूलों की क्यारी बना के रखूंगा
अब जब हर एक याद को क्यारी में दफनाना पड़े तो क्या कीजिये|
सुना था की लफ्जों में मतलब हुआ करते हैं, लफ्ज़ असूल हुआ
करते हैं
जब लफ्ज़ बे-मतलब होजाएं तो खाली किस्से क्यूँ सुना कीजिये|
बरसों से संभाल राखी थी एक तस्वीर अन्दर अपने
अगर वो तस्वीर खुद ही हाथों से गिर कर टूट जाये तो क्या
कीजिये|
बड़ी घोर से सुना करते थे जनाब किस्से मोहब्बत के आप
अब के कोई सुनाये, तो लम्बी साँस ले कर मुस्करा दीजिये|
यूं तो मुश्किल है होना, मगर अगर कभी कोई दावा करने आये
मोहब्बत का
कुछ कहना मत बस कुछ उपाहार देकर लौटा दीजिये|
बरसों से खुदा समझ कर इबादत जिन की करते रहे हम
फिर वो अगर इंसान भी न निकलें तो किस्से फरयाद कीजिये|
रास्ता अगर ख़तम होजाए चलते चलते तो परेशान क्यूँ होइए
और भी रास्ते हैं हजरत नया सफ़र शरू कीजिये|
और जिस शहर में गलत को गलत न मानते हूँ लोग
तकरार छोड़ कर आपने शहर को कूच कीजिये|
क्यूँ कर गुहार लगाइए इन्साफ की, क्यूँ जार जार रोइए
जहां मुंसिफ और मुदेयी दोनों हूँ बहरे वहाँ इन्साफ की क्या
उम्मीद कीजिये|
आप सही कहते थे उन दिनों जब ये किस्सा शरू हुआ था, पर हमने
सुनी कहाँ
अब जब वक़्त गुज़र गया बहुत तो पछता कर क्या कीजिये|
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