Wednesday, January 20, 2021

                                             क्या कीजिये!



सोचा था एक भरोसा काफी है ज़िन्दगी भर के लिए

अगर भरोसा ही न रहे तो भला क्या कीजिये|

सोचता था की हर एक याद को फूलों की क्यारी बना के रखूंगा

अब जब हर एक याद को क्यारी में दफनाना पड़े तो क्या कीजिये|

सुना था की लफ्जों में मतलब हुआ करते हैं, लफ्ज़ असूल हुआ करते हैं

जब लफ्ज़ बे-मतलब होजाएं तो खाली किस्से क्यूँ सुना कीजिये|

बरसों से संभाल राखी थी एक तस्वीर अन्दर अपने

अगर वो तस्वीर खुद ही हाथों से गिर कर टूट जाये तो क्या कीजिये|

बड़ी घोर से सुना करते थे जनाब किस्से मोहब्बत के आप

अब के कोई सुनाये, तो लम्बी साँस ले कर मुस्करा दीजिये|

यूं तो मुश्किल है होना, मगर अगर कभी कोई दावा करने आये मोहब्बत का

कुछ कहना मत बस कुछ उपाहार देकर लौटा दीजिये|

बरसों से खुदा समझ कर इबादत जिन की करते रहे हम

फिर वो अगर इंसान भी न निकलें तो किस्से फरयाद कीजिये|

रास्ता अगर ख़तम होजाए चलते चलते तो परेशान क्यूँ होइए

और भी रास्ते हैं हजरत नया सफ़र शरू कीजिये|

और जिस शहर में गलत को गलत न मानते हूँ लोग

तकरार छोड़ कर आपने शहर को कूच कीजिये|

क्यूँ कर गुहार लगाइए इन्साफ की, क्यूँ जार जार रोइए

जहां मुंसिफ और मुदेयी दोनों हूँ बहरे वहाँ इन्साफ की क्या उम्मीद  कीजिये|

आप सही कहते थे उन दिनों जब ये किस्सा शरू हुआ था, पर हमने सुनी कहाँ

अब जब वक़्त गुज़र गया बहुत तो पछता कर क्या कीजिये|

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