जिद;
ये एक खूबसूरत अंदाज़ है
इंसान का, मैं भी जिद बहुत करता हूँ, लेकिन जायज़ जिद| शायद मुझे इस जिद से बे-इन्तहा
पयार है, क्यूंकि यही जिद है जो मुझे गलत फैसले लेने से, या मानने से रोक पाती है|
मुझे हरदिन घुलाम बनाने की कोशिश की जाती है रिश्ते के नाम पर, संस्कार के नाम पर,
जज़्बात और फ़र्ज़ के नाम पर, मगर मैं झुकता नहीं हूँ, क्यूंकि मैं गलत सही को समझता
हूँ| मैं अच्छा ज़रूर होसकता हूँ लेकिन बेवकूफ नहीं की अपनों की गलत बातें भी मान
लूं| मैं उनसे तकरार कर पाता हूँ, उनके
फैसले ठुकरा पाता हूँ, उन्हें इनकार कर पाता हूँ| माँ बाप भी गलत होते हैं, होसकते
हैं, उन्हें समझाना उनकी हर बात मान लेने से कहीं ज्यादा बेहतर है|
हर किसी को घुलामी बहुत पसंद है, फ़िर चाहे वो माँ-बाप हूँ,
करीबी रिश्तेदार हूँ, धरम हूँ या सिस्टम्स हूँ| सब घुलाम चाहते हैं, क्यूंकि सवाल
करने वाले घुलाम नहीं बन पाते इसलिए सवाल पूछने वालों को बिगड़ा बच्चा कहा जाता है|
हमें घुलामि और फ़र्ज़ का अंतर ज़रूर समझना चाहिए, आखिर ये ज़िन्दगी हमारी है, फ़र्ज़ और
क़र्ज़ एक तरफ हैं और हमारी ज़िन्दगी एक तरफ है, गलत के आगे झुकने से कहीं अच्छा है
सच के आगे टूट जाना|
मैं देखता हूँ की मेरी जिद ने मुझे और अच्छा बना दिया है, और
आत्मनिर्भर बना दिया है,बहादुर हो गया हूं, कुछ करने से पहले किसी से पूछता नहीं हूँ, डरता
नहीं हूँ, क्यूंकि डर अक्सर गलत काम करने से या झूट के रस्ते पे चलने से लगता है,
जहां सच्चाई हो वहां डर नहीं होता| मैं हमेशा जिद किया करता था और करते रहना चाहता
हूँ, इन बेबुनियाद फ़र्ज़ और क़र्ज़ के नाम पर बनी परम्पराओं पर सवाल उठाते रहना चाहता
हूँ| इसलिए नहीं की मैं मगरूर हूँ बल्कि इसलिए की मैं अपने ज़मीर को मरने नहीं देना
चाहता| मेरा एक प्यारा कहता है की तू अकेला पड़ गया है, लेकिन मैं अकेला ठीक हूँ,
सच तो हमेशा से अकेला चलते आया है और झूट के पीछे भीड़ चलती आई है| मैं ने जो भी
जिद की है जायज़ की है और जीता भी हूँ| जहां मेरी जिद से किसि का हक पामाल होता हो
वहाँ मैं झुक के लौट आया हूँ| मैं चाहता हूँ की मेरे भाई बहन ज़िदी हूँ ताकि वो
अपनी मर्ज़ी का जीवन जी पायें, अपने फैसले कर पायें, सच और इन्साफ के लिए आवाज़ उठा
पायें, अपने माँ-बाप भी अगर गलत हूँ तो उनसे सवाल पूछ पायें| आखिर जिद भी तो एक
संस्कार ही है|
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