Saturday, January 16, 2021

 

वो इंसान जो नाम अपना सुनने के लिए, जुबान से मेरी तरस जाया करता था

आज कितना पुकारता हूँ नाम उसका मगर वो कहीं दिखाई नहीं देता|

अगर कहीं आंसू निकल जाता था कोई आँख से मेरी तो उसकी जान पे बन आती थी

आज रोता हूँ जार जार मगर वो कहीं आसपास दिखाई नही देता|

हैं बहुत लोग दुनियाँ की भीड़ मैं मगर

उसके जैसा दुनियाँ में कोई चेहरा दिखाई नहीं देता|

मैं शिकायतें बहुत करता हूँ उससे अक्सर

वो आता भी है सपने में साफाई देने, वो बोलता रहता है मगर कुछ सुनाई नहीं देता|

वो रास्ते, वो पेड़ पौधे, वो पहाड़ आज भी पूछते हैं मुझे उसके बारे में

मैं चुप रहता हूँ, क्या बताऊँ के वो मुझे भी आजकल इधर उधर दिखाई नहीं देता|

बड़ी उलझन में डाल गया है वो मुझ को

न भूल सकता हूँ न मुसलसल याद रख सकता हूँ, कोई रास्ता दिखाय नहीं देता|


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