वो
इंसान जो नाम अपना सुनने के लिए, जुबान से मेरी तरस जाया करता था
आज
कितना पुकारता हूँ नाम उसका मगर वो कहीं दिखाई नहीं देता|
अगर
कहीं आंसू निकल जाता था कोई आँख से मेरी तो उसकी जान पे बन आती थी
आज
रोता हूँ जार जार मगर वो कहीं आसपास दिखाई नही देता|
हैं
बहुत लोग दुनियाँ की भीड़ मैं मगर
उसके
जैसा दुनियाँ में कोई चेहरा दिखाई नहीं देता|
मैं
शिकायतें बहुत करता हूँ उससे अक्सर
वो
आता भी है सपने में साफाई देने, वो बोलता रहता है मगर कुछ सुनाई नहीं देता|
वो
रास्ते, वो पेड़ पौधे, वो पहाड़ आज भी पूछते हैं मुझे उसके बारे में
मैं
चुप रहता हूँ, क्या बताऊँ के वो मुझे भी आजकल इधर उधर दिखाई नहीं देता|
बड़ी
उलझन में डाल गया है वो मुझ को
न
भूल सकता हूँ न मुसलसल याद रख सकता हूँ, कोई रास्ता दिखाय नहीं देता|
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