Saturday, January 16, 2021

 

Aaj ki baat.

 

जानता हूँ, संस्कार, फ़रज़ और करज के नाम पे खुद को बंद कर लिया है तूने नियम-कानून के पिंजरे में।

कभी आज़ाद उड़ने की तमन्ना हो तो लौट आना, मैं तब भी वहीं रहूँगा, वैसा ही मिलूंगा खुली फिज़ाओं में, खाली आसमान में, उन्ही राहों पर, उसी मुस्कान और एहसास के साथ, उसी शांति और हंसी के साथ, खुली बाहों के साथ, ठहरी हुई निगाहों के साथ|

मैं जानता हूँ तू घूम फ़िर कर एक दिन घर ज़रूर लौटेगा, क्योंकि तू जानता है तेरी जगह कहाँ है।

मैं हमेशा वो जगह खाली रखूंगा जो तेरा घर है, जहाँ तुझे रहना है। जहाँ रह कर तू सब कुछ भूल जाता है, दुनियाँ पीछे छोड़ आता है।

शर्माना या हिचकिचाहट महसूस न करना, घर आते वक़्त कोई शर्माता है कभी भला?

हम कहीं भी रहें एक टीस अन्दर हमेशा रहती है कि मैं घर कब जाऊँगा, क्योंकि घर वो एहसास, उस अपनेपन की जगह है जहाँ सब कुछ अपना होता है, जहाँ कोई अपने जैसा होता है जो सब कुछ समझ सकता है, अन्दर की आवाज़ सुन सकता है, तुम्हें पढ़ सकता है।

मेरे अन्दर भी ऐसा ही तेरा एक घर है जो सिर्फ तेरा है नहीं तो खाली है, इंतज़ार में है, नज़रें झुकाए हुए, हाँ तू कभी कभी आता तो है अपने घर, पर लौट जाता है और मैं तुझे रोकता भी नहीं ये सोच के कि तू नाराज़ न होजये।


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