बच्चा
मेरे अन्दर एक छोटा सा बच्चा रहता
है जो असल में मेरा ही एक रूप है, मासूम सा है, प्यारा सा है लेकिन बहुत ज्यादा जिद्दी है, बहुत रोता है, कभी कभी हँसता भी है. आजकल वो कुछ ज्यादा ही जिद्दी हो गया है|
बहुत तंग करने लग गया है, वो चीज़ें मांगता है जो मैं उससे कभी नहीं ला के दे सकता,
जो मेरे हाथ में नहीं है, मगर वो समझता ही नहीं,
दिलासा दे कर मैं उससे सुला तो देता हूँ पर ज्यादा देर सो नहीं पाता, देर में सोता
है और सुबह बहुत जल्दी उठ जाता है और वही जिद्द करने लग जाता है| न खुद सोता है न
मुझे सोने देता है, न खुद अछे से खाता है न मुझे कुछ खाने देता है, बस मुसलसल जिद
किये जा रहा है|
बहला फिसला कर मैं उसको सुभे-शाम घुमाने ले जाता हूँ आजकल, अलग अलग पेड़ दिखाता हूँ जंगल में, परिंदे दिखाता हूँ और तब वो थोड़ा खुश रहता है और भूला रहता है, मुझ से बहुत सवाल पूछता है, ऐसे ऐसे सवाल की जिनके जवाब मेरे पास भी नहीं हैं, कभी कुछ बताता हूँ मैं और कभी टाल देता हूँ मगर उसके मासूम सवाल खत्म नहीं होते, बच्चा है ना? इसलिए बहुत से सवाल पूछता है जो की हम बड़े नहीं पूछते, क्यूंकि हम तो ज्यादा समझदार होगये हैं ना . क्या करों उससे दुनियादारी अभी पता नहीं है और ना मैं उससे बताना चाहता हूँ. उसके सवाल उसको जिंदा रखे हुए हैं| और कुछ पसंद भी तो नहीं आता उसको.
समझ नहीं आता उसके जवाब कहाँ से ढूंड के लाऊँ, या जवाब दूं भी की नहीं, पर वो मेरा वक़्त खराब बहुत करता है, मैं दुन्यादार हूँ न, वक़्त का बड़ा पक्का हूँ, समाज, परिवार का हिस्सा हूँ , उनके कहे पे चलता हूँ, सिस्टम से डरता हूँ, अनुशासित रहता हूँ की अगर कुछ गलत कर दूंगा तो लोग क्या सोचेंगे, किसी की परवाह क्यूँ करूं मैं, मुझे किसी से क्या मतलब. मगर उससे अभी इन
सब महान कामों का इल्म नहीं है न, वो किसी को मानता नहीं है, जो उससे सही लगता है,करता
है बिना किसी की परवाह किये हुए,
क्या करूं समझ नहीं आता, कभी लगता
है की उससे डरा धमका कर चुप करवा दूं, लेकिन फिर ये भी तो डर लगता है की वो झूट
बोलना सीख जायेगा, जो महसूस करेगा वो साँझा नहीं करेगा, चोरी करने लग जायेगा,
दूसरों जैसा होजाये गा, समाज का, वक़्त का मुहताज होजाये गा, अपने फैसले नहीं ले पायेगा
मेरी तरह, बस आज्ञाकारी बन जायेगा, रोना भूल जायेगा, अपना असलीपन छुपायेगा| फिर तो
बच्चा मर जायेगा न, जैसे हम बड़ा होकर खुद को
मार देते हैं और दुनियाँ में कहीं खो जाते है, बदल जाते हैं. नहीं, मुझे इस
बच्चे को जिंदा रखना है, कितना ही तंग करेगा आखिर मैं सह लूँगा पर इससे मैं जिंदा
रखूंगा| शायद ये मुझे अपने बड़े होने पर, समझदार होने पर, दूसरों की नज़र में अच्छा होने पर, मुआज़ज़ होंने पर सवाल उठाने
का मौक़ा देता रहे. मैंने कितने ही बच्चों को बड़ा होते देखा है, मासूमियत
खोते देखा है|
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