Friday, October 16, 2020

  

“मैं और तुम”

 

एक सच तो ये है कि, तू है तो है वजूद मेरा,

वरना कुदरत ये कारीगरी भला क्यूँ करती|

 

मगर सवाल ये भी है की तू तो तब भी था

जब मैं नहीं था और तू रहेगा भी जब मैं नहीं रहूँगा

 

असल में “मैं और तुम” जैसा कुछ है ही नहीं

जो तू है वही मैं भी हूँ, तेरी बनावट में और मेरी बनावट में कोई खास अंतर नहीं है

 

जो तेरे अन्दर होता है वही मेरे अन्दर होता है

तुझे दर्द होता है, ख़ुशी होती है, सो मुझे भी होती है|

 

वो तो जब मैंने और तूने किसी को पूछा होगा

तो किसी ने बता दिया होगा की हम कौन हैं, और हम ने मान भी लिया होगा|

 

तब तू ने भी अपनी एक पहचान बनाई होगी और मैं ने भी

यही कमबख्त पहचान थी जिसने हम को “मैं और तुम” में बाँट दिया होगा|

 

मगर जब गौर से देखना-समझना शुरू किया

तो पाया की ये पहचान तो महज़ लफ्ज़ी और बनावटी थीं |

 

असल में जो तू है, वही मैं भी हूँ

तुझे दर्द होता है, एहसास होता है, भूख प्यास लगती है, सो मुझे भी लगती है|

 

फ़िर हम बंटे क्यूँ हैं? लड़ते मरते क्यूँ हैं?

जब तू जानता है, मैं जानता हूँ हकीक़त, फिर हम डरते क्यूँ हैं? दिल-ओ-मन की बात कहने से, सच को सच, झूठ को झूठ कहने से, जो सच में हमारे अन्दर है, उसको खुल कर कहने से|

 

जो भी हो मगर ये सच है, क्यूंकि हमने इसको महसूस किया है

इस एकता को, इस मुकमिल्पन को, इस सचाई को जिया है|

 

सच कहूं तो सिर्फ मैं और तुम ही एक से नहीं

बल्कि यहाँ दुनियाँ में रहता हर इंसान एक जैसा है|

 

तो क्या हुआ जो अलग अलग दिखते  हैं, अलग-अलग खाते पीते हैं, पहनते हैं

असल में हैं तो एक ही, बहुत बारीकी से देखो तो कोई बुनियादी फ़र्क नहीं है, बस हमारी आँखों के सामने काल्पनिक दीवारें खड़ी हैं जो सच को देखने नहीं देतीं|

 

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