आज़ाद ???
यहाँ मुकामिल आज़ाद
नहीं मिलता कोई
हर कोई किसी न
किसी का पुजारी है|
यहाँ मिलता नहीं
कोई फर्द(व्यक्ति) खाली
हर किसी को कोई न
कोई ठेकेदारी है|
कोई बना बेठा है
हुकमरान, कोई मालिक जहां का
लाख़ों-करोड़ों हैं
जो महरूम हैं बुनियादी हक़ से, जिनकी ज़िन्दगी तक यहाँ उधारी है|
हर कोई लगा है
नकली पेहचानों को बनाने और बचाने मैं
इस दौड़ में वो भूल
चूका है जो उसकी असल जिम्मेदारी है|
नफरत इतनी सस्ती हो गयी है की हर दूकान में मुफ्त बिकने लगी है
अकाल सा पड़ गया है
जैसे मोहब्बत का और अगर कहीं है भी तो वक़ती है या उधारी है|
हर कोई मज़हब, ज़ात
पूछता-बताता फिरता है
बटे हुए हैं हम “हम”
और “उन में” हर चीज़ में “हमारी” –“तुम्हारी” है|
सोचता हूँ की हम
ने क्यूँ बाँट कर इस से टुकडों में “जहनुम” बना दिया है
ये जो जन्नत सी
खूबसूरत धरती हमारी है|
आज़ाद हो जाऊं इस जाल से जल्द, हर हाल इस कोशिश में रहता हूँ
ये जो बेबुनियाद कानून हैं, बंदिशें हैं, ये जो उलझन भरी ज़िन्दगी हमारी है|
यहाँ मुकामिल आज़ाद
नहीं मिलता कोई
हर कोई किसी ना
किसी का पुजारी है|
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वाह!!!बेहतरीन
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