Tuesday, May 12, 2020


                              कुछ सवाल खुद से भी !!





“मुसलमान, मोहम्मडन, मुस्लिम, इस्लाम” जब भी हम ये लफ्ज़ पढ़ते  हैं, बोलते हैं या सुनते हैं तो  हमारे दिमाग में अलग-अलग तस्वीर बनती है, इस तस्वीर का बनना इस बात पर बहुत निर्भर करता है कि हम, इन लफ्ज़ों से जुडी कितनी और किन-किन चीज़ों को जानते हैं| किसी के मन में  ये लफ्ज़ सुन कर एक ऐसे इन्सान की तस्वीर बनती है जो उसकी नज़र में इन्सान है ही नहीं, किसी के मन में एक लम्बी दाढ़ी वाले और सर पर  टोपी वाले, सलवार कमीज़ पहने हुए , या नक़ाब से सर ढके  हुए  इन्सान की तस्वीर बनती है| कोई इन लफ्ज़ों का जुडाव किसी  कबाड़ उठाने वाले, सब्जी बेचने वाले, मांस बेचने वाले, हजाम की दुकान वाले, रिक्शा  चलाने  वाले या बाकि  छोटे-मोटे काम करने वाले लोगों  से करते हैं| कोई इन्हें पाकिस्तान के समर्थक या पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के समर्थक के रूप  में जानता है, कोई इनका नाम आतंकवाद  से जोड़ के देखता है तो कोई जिहादी के नाम से जानता  है, कोई औरंगजेब और गज़नवी से जोड़ के देखता है, वहीँ एक छोटा सा तबका वो भी है जो थोड़ी अलग राय रखता है वो इन लफ्ज़ों को सुन कर कुछ जाने माने लोग जैसे अब्दुल कलाम, अबू अल कलाम आज़ाद, बिस्मिल्लाह खान, शारुख खान, सलमान खान आदि  का तस्सवर  करता है| अगर कोई ज्यादा ही समझदार हो तो वो कुछ अतिरिक्त  जानकारी भी रखता है|

लेकिन सब से मशहूर है टीवी पर दिखाया गया मुसलमान, एक अलग ही तस्वीर दिखाती  है हमारी ‘टीवी’ , और धीरे-धीरे ये तस्वीर हम सब के दिमाग में भी बैठ  जाती है और हमें भी हर इन्सान में वही टीवी वाला मुसलमान दिखाई देने लगता है| जिस के नाम से लोग डरते हैं गोया वो उनका दुश्मन ‘मुसलमान बन कर धरती पर आया है| ये चर्चा सुनने को आम मिल जाती  है कि “ये लोग” कभी हमारे नहीं हो सकते, वफ़ादार नहीं हो सकते, भरोसा करने लायक नहीं हो सकते और भी बहुत कुछ| मगर एक सवाल ये भी है के टीवी तो कुछ साल पहले ही आई, फिर ये सब इतना जल्दी कैसे हो गया? अगर हम सोचने लगें तो असल में इसकी जड़ें बहुत गहरी  हैं| ये जो तस्वीर आज हम सब देखते हैं इस के बनने में  हज़ारों साल लगे हैं| सातवीं सदी में जब इस्लाम का जन्म हुआ तब उसके सामने दो मज़हब और थे -ईसाइयत  और यहूदियत, ये मज़हब की लड़ाई जो आज हर जगह देखने को मिलती है इस की शरुआत वहाँ से हुई| लड़ने का सीधा सा नीयम है लड़ाई  में या तो कोई दुश्मन पैदा कर लो या दुश्मन बना लो क्यूंकि  बिना दुश्मन लड़ाई तो लड़ी नहीं जा सकती| किसी भी विचारधारा को पनपने के लिए संख्या चाहिए, इस लिए सब की नज़र संख्या पर ही होती है| इस सातवीं सदी की लड़ाई ने दुनियाँ को एक नया शब्द दिया “जिहाद” जिस से दुनियाँ की सब से बड़ी कुर्बानी कहा जाने लगा, किसको पता था हज़ारों साल बाद ये विचार दुनियाँ को बर्बाद करने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा| हर एक विचारधरा और उसको मानने वालों की एक अपनी अलग सी पहचान हुआ करती है जो उनके लिए सब कुछ होती है| अब इस पहचान को  बचाना और फैलाना  उनके लिए सबसे बड़ा काम होता है, कुछ यूं ही हुआ भी | धीरे-धीरे इस्लाम पूरी दुनियाँ में फेलने लगा, क्यूंकि  अरब व्यापार के सिलसिले में दुनियाँ के अलग अलग कोनों में फेले थे, इस दौरान वो अपने साथ इस्लाम भी ले आए|

तारीख़ बताती है कि भारत में इस्लाम आठवीं या नवि सदी में पहुंचा, क्यूंकि उस वक़्त अरब ताजिर समुन्दर के रास्ते से आते थे इसलिए ये दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों  तक ही महदूद रहा| उत्तर भारत में इस्लाम बारहवीं  सदी में पहुंचा| ये विचारधारा यहाँ भारत में फैलाई गयी, वक़्त के साथ यहाँ के लोग इस्लाम अपनाने लगे, संख्या बढ़ने  लगी, इसी बीच मध्यपूर्वी  एशिया से शासक यहाँ आने लगे, बाद में वो दिल्ली  सल्तनत के नाम से जाने गए| इन शासकों  ने  भारत के एक बड़े हिस्से पर सदियों  तक राज किया, बाद में मुग़ल भारत आए और उन्होंने ने भी देश के एक बड़े भू-भाग पर कई पीढ़ियों तक शासन किया | इस बीच धर्म  उनका सबसे बड़ा हथियार रहा क्यूंकि  ये लोगों को तोड़ने और जोड़ने के काम आया करता था, तारीख़ बताती है कि किस क़दर अत्याचार हुए, लोगों का ज़बरदस्ती धर्म  परिवर्तन हुआ, मज़हबी इदारे तोड़े गए और भी बहुत कुछ हुआ| इस सब का एक बड़ा मकसद तब भी सत्ता था और आज की दुनियाँ में बस  सत्ता है, लेकिन नुक्सान तब भी आम इन्सान का हुआ और आज  भी उसी का हो रहा है| अगर मज़हबी फूट के इतिहास  में अंग्रेजों का ज़िकर न आए तो नाइंसाफी होगी| अंग्रेजों  ने भारत की संस्कृति का अध्यन  कर एक नया तोड़ निकला जिसे आज हम “फूट डालो और राज करो” के नाम से जानते हैं| जब सब लोग एकजुट होकर आज़ादी  की लड़ाई लड़ने लगे, तब उनके पास कोई और चारा न था तो मज़हब के नाम पर बाँट दिया| इतिहास में खून खराबे और हिंसा की बे-शुमार कहानियाँ  हैं, परन्तु विभाजन ने इस पूरी तस्वीर को एक नया रंग दे दिया, ‘मज़हबी रंग’| लाख़ों की संख्या में लोग मारे गए, बे-घर हो गए और कुछ तो आज भी खराब हालत में हैं| इस सब के पीछे एक चीज़ थी धर्म  और दूसरी सत्ता की भूख, लेकिन यहाँ भी कीमत उन्हीं गरीब आम लोगों को चुकानी पड़ी जिनका धर्म  से कुछ ख़ास लेना देना नहीं था, बस बलि  के बकरे बन गए|
विभाजन ने इन बढ़ती हुई दूरियों को एक गहरी खाई का रूप दे दिया, और कुछ लोगों ने अपने फायदे क लिए इन् खाइयों को और गहरा कर दिया| विभाजन ने हम को दो टुकडों में बाँटने के साथ-साथ लड़ने के लिए दुश्मन भी दे दिए  और ये आपसी दुश्मनी का सिलसिला शरू हो गया. फिर कश्मीर के नाम पर  एक बार फिर सातवीं-आठवीं सदी का ‘कांसेप्ट’ “जिहाद” जिंदा हुआ| इस जिहाद ने आतंकवाद  को जन्म दिया लेकिन यहाँ भी सत्ता किसी  ने संभाली  और कीमत किसी और ने चुकाई| बड़ी-बड़ी संस्थाएं बन गयी और उनमें नौजवान लडकों को शामिल किया जाने लगा जो एक काल्पनिक जन्नत  और दुनियाँ की खातिर एक दिखाए ख्वाब के लिए लड़ने लगे और मरने व मारने लगे| कारण था ग़रीबी, जहालत और इसका फ़ायदा उठाया कुछ धर्म  के ठेकेदारों ने, जो उन्हें कभी न पूरा होने वाला ख़्वाब दिखा कर बेगुनाह लोगों को मार कर अपनी रोटियाँ सेकते गए| इस सब से  दुनियाँ के सामने मुस्लमान की एक तस्वीर बनाई और उसके साथ डर जुड़ गया, वो डर जो धीरे धीरे नफरत में बदल गया और ऐसी नफरत के जिसकी कोई हद ही नहीं रही|

1947 का बटवारा मानव इतिहास  का एक बहुत बड़ा कोहराम था, जिसमें लाखों की संख्या में बेगुनाह लोग बेबुनियाद नफ़रत की वजह से अपनी जान गवा बैठे| उन में ज्यादा तर लोग तो वो थे जिन्हें आजादी के दिन ही मालूम हुआ कि मुल्क का बटवारा हो गया है, वो वतन जहाँ वो सालों से रह रहे थे, बिना कुछ सोचे समझे छोड़ना पड़ा| नफ़रत, आशंकाओं और  खोफ ने सब कुछ भुला दिया, बिना किसी  मंजिल के वो चल दिए वीरान राहों पर और फिर बरसों तक ज़िल्लत  की ज़िन्दगी जीनी पड़ी| बटवारे के किस्से सुन कर आज भी दिल देहल जाता है, और सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि, किस क़दर इन्सान वहशी  होगया था और बदले की आग में, बहकावे  में आ कर उस ने खून की नदियाँ बहा दी| इत्तेफ़ाक तो ये था कि जिन लोगों की वजह से बटवारा हुआ वो आराम से जहाज़ या स्पेशल ट्रेन से गये और जिनके नाम पर बटवारा हुआ वो गाजर-मुली की तरह कटते गए, कुछ ने डर के मारे आत्महत्या कर ली, कुछ ने धर्म  परिवर्तन कर लिए और न जाने क्या क्या हुआ|

इस घटना से सबक सीख कर बजाये कुछ ऐसा करने के फिर ये हालात या ख्याल पैदा न हों, हम ने एक दुसरे को अल्पसंख्यक  और बहुसंख्यक कह कर बाँटना शरू कर दिया| फिर कुछ नेता चुन लिए गये जो उनकी बात करते, अपनी-अपनी पहचाने  बनायीं और उनको बचाए रखने के लिए कई  मंसूबे बनाये गये| जान बूझ  कर एक तबके को तालीम से महरूम रखा गया, और जिनको थोड़ी बहुत तालीम मिली भी, तो उसके तय  करने वाले कोई और थे| धार्मिक शिक्षा पर जोर दिया गया और धार्मिक विचारधारा को बढ़ावा दिया गया| असल में वो धर्म  के नाम पर एक जैसी सोच के लोग पैदा करने की चाल थी जो वक़्त आने पर बिना सवाल किये हुक्म बजा सकें| लोगों को जान भुझ  कर बुनियादी ज़रूरतों से महरूम रखा गया ताकि वे  जीवन भर इन्ही मुदू में उलझे रहें और खुद के बारे में कभी सोच ही न पायें और सवाल करने का वक़्त न मिल पाए| वक़्त के साथ साथ ज़रूरत पड़ने पर इन्हीं आम लोगों का इस्तेमाल अलग-अलग मकसदों से किया गया| कभी किसी दंगे में किसी अमीर का बेटा, या किसी अला दर्जे के अफसर या नेता का बेटा शिकार नहीं बनता, अक्सर बलि का बकरा गरीब ही बनते हैं| वो लड़ते हैं जिन्हें धर्म  या पहचान से कुछ खास लेना देना नहीं है, लेकिन डर या पागलपन सब करने पर  मजबूर करता है| फ़ायदा  कोई और ले जाता है और फना कोई और हो जाता है, लड़ाई कोई भी हो कीमत वो ही चुकाते हैं जिन्हें लड़ाई से कोई ख़ास मतलब नहीं रहता|

मुस्लमान भी इस सब का शिकार हुए, उनको शिक्षा से दूर रखा गया और अगर दी भी तो बस धार्मिक शिक्षा जो धार्मिक कम और अधार्मिक ज्यादा बनाती चली गयी, सोचने और समझने की क्षमता ख़तम करती चली गयी, अगर कुछ सवाल उठे भी तो उनके जवाब किसी और ने दिए| एक काल्पनिक दुनियाँ का सपना दिखा कर, नर्क के मंज़र से डरा कर वो सवाल शांत कर दिए गये| उनको जान बूझ  कर बुनियादी ज़रूरतों और अधिकारों से वंचित रखा गया लेकिन एक पहचान ज़रूर दे दी गयी| एक छोटा सा तबका  पढ  लिख कर आगे निकल गया तो उन्होंने  भी वक़्त-फ-वक़्त पिछड़ो का इस्तेमाल ही किया| मैं  बहुत सारी धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक गुरुओं  को इस सब का ज़िम्मेदार  मानता हूँ| धर्म  के नाम पर कई औलादें  पैदा करना हो या बच्चों  को मदरसों में  तालीम दिलाना दोनों ने इस कौम को पीछे धकेल दिया| नतीजा ये हुआ कि संख्या बढ़ने से गरीब और गरीब हो गये और एक तरीके की शिक्षा ने कट्टरपंथी  विचारों को जगह दे दी| शरियत के नाम पर कई  सारी गलत चीज़ें चलती रहीं(तीन तलाक, बहुविवाह , पर्दा, नाबालिक लड़कियों की  शादी, लडकियों को शिक्षा न देना आदि)| धीरे-धीरे गरीबी, जहालत, कट्टरपंथी, अन्ध्भाक्ती, बदलाव विरोध, एक अलग सी पहचान  जैसी बीमारियाँ इस कौम में  आ गयी| हालांके कुछ लोग बहुत अच्छे  भी थे मगर उनकी संख्या बहुत कम रही और वो या तो चुप रहे या सेफ़ जोन में  चले गये|

गरीबी के कारण वो बच्चों  को शिक्षा नहीं दे पाए इसलिए रोज़ी रोटी की खातिर बचपन में  ही बच्चों  ने कई  सारी बुरी आदतें इख्तेयार कर  ली| बड़े हो कर वो या तो छोटी-मोटी  सेवाओं में  लग गये या मज़दूरी कर के गुज़ारा  करने लगे| गरीबी का फ़ायदा  उठा कर इन्ही  बच्चों  को कहीं तालिबानी बना दिया गया, कहीं मुजाहिदीन  बना दिया गया, कहीं ड्रग्स या हथियारों की तस्करी  में  लगा दिया गया| पाकिस्तान से आए एक  आतंकी अजमल कसाब की कहानी इन सब पहलुओं  पर रौशनी डालती है कि, कैसे मजबूरी का फ़ायदा   उठा कर, सपने दिखा कर कुछ लोग उनसे बेगुनाह लोगों को ख़तम करवाते हैं| कश्मीर हो, पाकिस्तान हो ,  अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया हो या नाइजीरिया, कहानी हर जगह  तकरीबन एक जैसी ही है| वो मज़हब जिस का फ़लसफ़ा ये बताता है कि अहिंसा, प्रेम, भाईचारा, हमदर्दी, इमदाद, अच्छा बर्ताव, सब का आदर करना, सबको  उनका  हक दिलाना, किसी चींटी जैसे जानवर तक को न मसलना, फूलों की पंखुड़ियों तक को पैरों से न मसलना, मॉम से ज्यादा नरम रहना, वाघेरा वाघेरा| उस धर्म  को चंद ठेकेदारों ने अपने फ़ायदे की खातिर इस क़दर बदल दिया है कि आज इस धर्म  के मानने वालों को खुद से ही डर लगता है|

कश्मीर की वो घाटी जहाँ सूफी प्रथा का चलन था, जहाँ धर्म  के नाम से  किसी इन्सान की पहचान नहीं थी, जहाँ बुद्ध , हिन्दू, सिख  इस क़दर घुल मिल कर रहते थे गोया एक ही बाघ के फूल अलग हो कर भी साथ रहते हों,  और चमन की खूबसूरती बढ़ते हों| त्यौहार हो  या शादी  पता ही नहीं चलता था की किसका त्यौहार है, सब मिल कर झूमते गाते थे, खुशियाँ मनाते थे, पंडित जिन्होंने  पूरे  कश्मीर में  इल्म की शमा रोशन की, सब को पढ़ना लिखना सिखाया आखिर अपना घर छोड़ने पर मजबूर हुए और आज भी कश्मीर उनकी आँखों में  बसता है|

ये सब चंद लोगों की चाल है जिन्हें दूसरों की जान की परवाह नहीं, अपना लाभ  देखना है| उन्हें किसी की परवाह नहीं बस सत्ता चाहिए, आराम चाहिए| अगर कुछ करना है, अगर खुद भी ख़ुशी से जीना है और दूसरों को भी ख़ुशी से जीने देना है, अगर इज्ज़त से जीना है, अगर इस दुनियाँ को एक खूबसूरत और पुर-अमन जगह बनाना है तो हम सब को मिल कर सोचना होगा, जो जहालत के अँधेरे में  हैं उन्हें इल्म की रौशनी से रौश्नास कराना होगा, उनको गरीबी से ऊपर लाना होगा, उन्हें बदलाव का हिस्सा बनाना होगा, उन्हें सपना न दिखाकर हकीकत से रोबरू कराना होगा, उन्हें गलतियों  का एहसास दिलाना  होगा, ज़रूरत पड़ने पर सज़ा दिलानी  होगी  ताकि  वे  फिर कभी गलत न करे, उससे जीना सिखाना होगा, इन धार्मिक व्याख्याओं  को भूल कर असल धर्म  को अपनाना होगा| ये किसी एक इन्सान या किसी एक समूह  का काम नहीं हम सब को हाथ बटाना होगा|

ये जो सड़क पर  खड़ा मुसलमान  हम देखते हैं, ये जो टीवी का बताया मुसलमान  हम देखते हैं वो असल में  ऐसा है नहीं, बस बना दिया गया है, उसे तो ये भी नहीं पता वो ऐसा क्यूँ है? बस किसी ने बना दिया तो बन गया| असल में  उस बदनाम चेहरे के पीछे एक बेबस और लाचार इन्सान खड़ा है, जिसे धर्म  से कुछ लेना देना नहीं है उसे बस दो वक़्त की रोटी बहुत है, लेकिन ये टोपी, दाढ़ी और खुले खुले कपडे भी एक मजबूरी है, उसे यही बताया गया है, उसकी दुनिया शायद यही है, वो न इधर का है न उधर का| स्कूल से पहले और स्कूल के बाद एक बच्ची  अपने बाप की मदद करने उसकी ठेली पर आती है, उसकी सहायता करती  है, चंद रूपए बन जाएँ और वो रात को खाना खा लें ये उनका सब से बढ़ा धर्म  है बाकी तो बस कही-सुनी बातें हैं,बातों का क्या| उस बच्ची  का सपना किसी को मारना  या नुकसान पहुँचाना हरगिज़  नहीं है, उसे  पड़ लिख कर कुछ ऐसा करना है  कि वो अपने बाप को खुश रख सके-ये उसके लिए उसका धर्म  है| उन्हें हमारी नफरत नहीं बस थोड़ा सा प्यार  चाहिए, दाढ़ी और टोपी देख कर नफरत करने से पहले एक बार देख तो लें कि वो क्यूँ है और क्या है और हमें उससे क्या खतरा है?

इस्लाम का नाम सुनते ही हमारे अन्दर एक नफरत सी पैदा हो जाती है, एक गलत और भयानक सी तस्वीर बन जाती है, असल में  ये इस्लाम ऐसा है नहीं, ऐसा दिखाया गया है, निजि फायदे  के लिए इसे बदल दिया गया है| ये भी बाक़ी धर्मों  की तरह एक तरीका है जीवन जीने का, ठीक जैसे बाकी धर्म  हैं, इसमें  कमियाँ हैं और खूबियाँ भी, इसमें  सवाल की गुंजाईश है और न मानने की इजाज़त भी, मगर, हमारे चश्मे बदल दिए हैं इसके समर्थको ने भी और विरोधियों ने भी, जैसा कि हर धर्म  के साथ हुआ है| धर्म,धर्म  न रह कर बस नफ़रत का ज़रिया बन गया है, एक प्रथा, एक पहचान मात्र बन गया है| जिसका मकसद था लोगों को सही रास्ता दिखाना, सोचना सिखाना, जीना सिखाना, वाही आज भटका रहा है, मरवा रहा है| धरम तो एक रास्ता है एक मुकाम तक पहुँचने का, हम ने इसे महज़ एक हथियार बना लिया है, खुद को रंगों में  लपेट कर बाँट दिया है, हम बस प्रचारक बन गये हैं असली मकसद तो बहुत पीछे छूट गया है| जहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं, संख्या की लड़ाई नहीं, पहचान की होड़  नही, मारा-मारी नहीं, भेद-भाव नहीं, नफ़रत नहीं, लालच नहीं, धर्म  तो वही है बाकी तो बस अधर्म है, दिखावा है और कुछ नहीं|


                                                   *************


No comments:

Post a Comment

                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...