तराने
ये तराने ऐसे हैं के ना आएंगे समझ मैं
तुम्हारी
क्यों पूछ पूछ के भला सर अपना खपाते हो|
हम हैं के खुश हैं, बहुत कुछ खो कर भी
हमदर्दी
के नाम पर तुम क्यों आंसू बहाते हो |
अब जब में चुप हूँ तो क्यों पुरानी कहानियां सुनाते हो |
तुम्हें पता है वो आंखू से आँसू की नदियाँ बहना, वो आंखू का आ जाना
अब जब के आरजू है न तमना कोई, फिर क्यों सूखे पोधूं को पानी लगाते हो|
अब जाओ भी के मुझे हैं काम और बहुत सारे
तुम क्यों बार बार मेरा सबर का इम्तेहान लेने आ जाते हो|
बड़ी मुश्किल से मैं निशान मिटाता हूँ कदमों के तुम्हारे
फिर क्यूँ बार बार, बिन बुलाये तुम लौट आते हो|
ये तराने ऐसे हैं के न आएंगे समझ मैं तुम्हारी
क्यूँ पूछ पूछ के भला सर अपना खपाते हो ||
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