बेनाम रिश्ते
हम इंसान हैं, इंसानों के बीच रहते हैं तो ज़ाहिर सी बात है कोई
न कोई सम्बन्ध बना लेते हैं या बन जाते हैं| फ़िर हम इन रिश्तों को नाम देने लगते
हैं, शायद आसानी होती है समझने में| लेकिन वक़्त गुजरने के साथ रिश्ते और एहसास
कहीं धूर पीछे छूट जाते हैं और नाम बच जाते हैं| एक बात तो साफ़ है की हमारी
ज़रूरतें हमें पास लाती हैं और ये नेचुरल भी है, जब ज़रूरत कम होजये तो रिश्ते अपना मायिने खो देते हैं| साइंसदान
तो इसको सही बोलते हैं|
लेकिन कुछ रिश्ते अगर बे-नाम ही रहें तो ही अच्छे हुआ करते हैं,
वो अगर ज़रूरत और मतलब के पैमाने से बहार ही रहें तो अच्छे लगते हैं| जैसे बच्चों
की हंसी का रिश्ता, अनजान हमसफ़र का रिश्ता| रिश्तों को नाम और बंधन में बांध कर हम
उनका असली मतलब खो देते हैं, फ़िर तो तू और मैं की दुनियाँ में जीने लगते हैं, एक दुसरे के मालिक बन बैठते
हैं| ज़रूरी नहीं की हर रिश्ते का कोई नाम हो, हर रिश्ते से आपको कोई फाईदा हो,
वक़्त से बंधा हो| बल्कि आज़ाद हो, परिंदे की तरह|
मुझे तो ये आज की दुनियाँ के रिश्ते, रिश्ते कम सौदाबाजी ज्यादा
लगते हैं, इस बाज़ार में सामान हो जाने से अच्छा है की तुम जो हो वही रहो, अपने
जैसे रहो, खुद में और खुद के लिए रहो, वरना कल रोते फिरो गे और समझ न पाओगे की
खोया क्या है और पाया ही क्या था|
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