Friday, January 29, 2021

 

तुम


जो थकावट में आराम देती है वो मीठी नींद हो तुम

जो मायूसी में मुस्कान लाती है वो उम्मीद हो तुम,

जो चेहरे पे पड़े और नींद खुल जाए वो सूरज की चमकती किरण हो तुम

जो अकेले में भी महफ़िल का एहसास दिलाये वो संगीत हो तुम,

जिससे देख कर कुछ देखने की तमन्ना नहीं रहती, जिससे पा कर कुछ पाने की उम्मीद नहीं रहती

वो दिलकश नज़ारा हो तुम, वो अनमोल रतन हो तुम,

जिसकी डांट खा कर किसी सजा की ज़रुरत नहीं रहती,

वो चारा गार वो कार-ऐ-साज़ हो तुम,

जिससे हर एक शिकायत करता हूँ मैं और कभी अर्जी ठुकराई नहीं जाती

वो इन्साफ पसंद मुंसिफ हो तुम वो अदालत हो तुम,

जिसके होने से घर भरा भरा सा लगता है मेरा

वो मुकमिल्पन का एहसास हो तुम,

कहाँ कहाँ से निकालों तुमको, समझ नहीं आता

मेरा सब कुछ हो तुम और सब कुछ में मोजूद हो तुम,

हाँ अब नहीं दिखते तुम अक्सर, नजाने कहाँ रहते हो

फ़िर भी एहसास है की शायद हर वक़्त मेरे साथ हो तुम|

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