Naaz
मुझे
भी नाज़ हुआ करता था अपनी पसंद -न-पसंद पर
अब
मैं बेठ कर उसी नाज़ पर सवाल करता हूँ|
ज़ाहिर
था की वक़्त बदले तो बदल जाया करते हैं किस्से सारे
यकीन
इतना था की कुछ मानता नहीं था मैं, आज मैं उस यकीन पे रंज-ओ- मलाल करता हूँ|
कोई
फलसफा कहता था की गहराई पता चलती है डूब जाने से
जब
बहुत सारे डूब चुके थे, फ़िर मैं क्यू डूबा, मैं उस फलसफे पे सवाल करता हूँ|
मुझे
जाना कहीं और था तो फ़िर मैं इस रास्ते भला क्यूँ कर चला आया
खूबसूरत
थी वो दुनियाँ भी, मगर आरजी थी, ये सोच कर मैं खुद से सवाल करता हूँ|
ऐसी
बातों को मैं अक्सर हंस कर टाल आता था, पर मैं उस वक़्त क्यूँ न टाल पाया
वो
हिम्मत थी मेरी या नासमझी, या इतेफाक कोई, ये सोच कर मैं खुद को मुहाल करता हूँ|
सुना
था बड़ी खूबसूरत चीज़ है ये मोहब्बत, मगर कठिन होता है रास्ता बहुत
आदतन
हो भी गयी थी, हमसफ़र पे भरोसा भी था, कठनाई सह कर भी मैं आज इस बात का ख्याल करता
हूँ|
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