Wednesday, November 18, 2020

                                                                  इम्तेहान

 

क्यूँ डरता है तू इस क़दर वक़्त से दोस्त

आदत है तेरी मुश्किलों को पार करना, ये भी महज़ एक इम्तेहान ही तो है”


माना की ज़िन्दगी में तेरी कुछ ग़म हैं परेशानियाँ हैं

तो ये मलाल कैसा, जहां है रेगिस्तान वहाँ हरा भरा गुलिस्तान भी तो है”


माना की रास्ता कठिन है और तू खड़ा है इस किनारे तोफानी दरया के

हिम्मत का पुल बना कर कर ले गा पार तू, और फिर उस पार अपना मकान भी तो है”


अभी कुछ वक़्त तो बेचैनी हो गी ही दोस्त, कुछ समझ न आएगा तेरे

सब्र कर आएगी बहार भी, ये चंद दिन का मौसम-ऐ-खज़ान(Autumn)ही तो है”


क्यूँ खयालों के जाल बुनता है, क्यूँ दिन रात सोचता है

कोई विरासत थोड़ी ही है ये दुनियाँ तेरी, तू चंद दिन का मेहमान ही तो है”


अब छोड़ भी दे ना, कितनी उम्मीद रखे गा उन से

उनकी भी तो ज़िन्दगी है, खवाहिशें हैं, आखिर वो भी एक इंसान ही तो है”


जोर लगाना है तो खुद पे लगा, दोष देना है तो खुद को दे

उस दरबार में फरयाद कैसी, अर्जी कैसी, जहां कोई सुनता तक नही, ऐसे दस्तूर-ऐ-अदल(justice system) से तू अयाँ भी तो है”

और फिर कहाँ खाली रहती है ज़मीन दोस्त, तू घबराता क्यूँ है

जहां देखो छत पे चादर सा तना आसमान भी तो है”


क्यूँ डरता है तू इस क़दर वक़्त से दोस्त

आदत है तेरी मुश्किलों को पार करना, ये भी महज़ एक इम्तेहान ही तो है”

Shafiq. 

                                           ************

No comments:

Post a Comment

                                                                     خود سے ایک گفتگو  باہری خوبصورتی اور حُسن ایک چیز ہے لیکن اصلی خوبصورتی...