Monday, February 21, 2022

                                                           मन और मेरे बीच की तकरार 


कभी कभी मुश्किल होता है मेरे लिए ये फैसला ले पाना की मैं चुप रहूँ, उदास हो जाऊं या हंसूँ, क्योंकि आलम ये होता है की तीनों चीज़ें एकसाथ हो सकती हैं, मन सब कुछ करने को उकसाता है बहुत सी गुज़री बिसरी चीज़ें दिखलाता, याद करवाता है, लेकिन मैं कुछ नहीं करता बस शांत रह कर देखता हूँ इस सब को|

मन कहता है की ये ऐसे हुआ होता तो क्या होता, राह कुछ और होती, मैं कहता हूँ वो भीत चूका है और अब वो व्यर्थ है| मेरे सामने आज है और यही ज़रूरी है, गुज़रे कल की बस इतनी अहमियत है की उसने बहुत कुछ सिखाया है और इंसान यूँ ही बनता है, ठोकर खा कर, हार कर, असफल होकर, डूब कर|

मन ये बताता है बार बार की मैं ने क्या खोया है, वो ये नहीं बताता की मैं ने कितना कुछ पाया है, मन पिंजरे में केद रखना चाहता है, वो बंधे रहने की सलाह देता है, चलते रहने से रोकता है, शायद चलते रहने से सत्य से  करीबी हो जाती है, और वहां मन का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है|

मन हारने से, झुकने से, पीछे हट जाने से डरता है, वो अकसर मना करता है की हारो मत, झुको मत, हटो मत| इसी कारण हम कही बार कुछ ऐसी चीज़ों के पीछे लगे रहते हैं जो व्यर्थ होती हैं, जहाँ हमें नहीं होना चाहिए|

मन को क्या मालूम की हार जाने में, हट जाने में और झुक जाने में और जो होता है उससे हो जाने देने में कितना सुकून है| जब कुछ छूट जाता है तो हम सब परेशान और दुखी होते हैं, कोसते हैं, थक जाते हैं और निराश हो जाते हैं, मगर ये नहीं सोचते की चलते रहे तो अगले मोड़ पर कुछ नया देखने को मिलेगा, सीखने को मिलेगा, जो इस सब से कही गुना ज्यादा बेहतर होगा|

ज़िन्दगी और जिंदा होने का नाम चलते रहना ही है, चाहे वो अन्दर की यात्रा हो या बहार की| एक मुकाम पे पहुँच के आपको लगता ही नहीं की जहाँ सिमट जाने की आपको तड़प थी वो कुछ भी नहीं था|


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