Saturday, March 27, 2021

 दोस्त 

दोस्त अक्सर बे-खबर रहे तकलीफ से मेरी

कभी मैं बयाँ न कर पाया और कभी वक़्त दरुस्त न था उनके पूछने का|

अपने कभी मुजाहिरा कर ही न पाए अपने-पन का

न सहारे की तव्को की कभी मैं ने, न मौक़ा दिया उनको हाल पूछने का|

कभी बे-बसी हुई तो सोचा की कोई चारा-साज़ हो अपना भी

फ़िर चुप रहना ही सही समझा, शायद डर था उनके पलट कर “ला-जवाब”सवाल पूछने का|

मैं अपनी मुश्कलें अपनी कविताओं के ज़रिये उतार देता हूँ कागज़ पर

अलफ़ाज़ सुन लेते हैं आवाज़ मेरी, ख़ामोशी मौक़ा दे देती है मुझे खुद के लिए सोचने का|

यूं ही इस सफ़र में दोस्ती हो गयी खुद से

ये सिलसिला यूं ही चलता रहा फिर खुद को मनाने का, कभी खुद से रूठने का|

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