दोस्त
दोस्त अक्सर बे-खबर रहे तकलीफ से मेरी
कभी मैं बयाँ न कर पाया और कभी वक़्त दरुस्त न था उनके पूछने
का|
अपने कभी मुजाहिरा कर ही न पाए अपने-पन का
न सहारे की तव्को की कभी मैं ने, न मौक़ा दिया उनको हाल
पूछने का|
कभी बे-बसी हुई तो सोचा की कोई चारा-साज़ हो अपना भी
फ़िर चुप रहना ही सही समझा, शायद डर था उनके पलट कर “ला-जवाब”सवाल
पूछने का|
मैं अपनी मुश्कलें अपनी कविताओं के ज़रिये उतार देता हूँ
कागज़ पर
अलफ़ाज़ सुन लेते हैं आवाज़ मेरी, ख़ामोशी मौक़ा दे देती है मुझे
खुद के लिए सोचने का|
यूं ही इस सफ़र में दोस्ती हो गयी खुद से
ये सिलसिला यूं ही चलता रहा फिर खुद को मनाने का, कभी खुद
से रूठने का|
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