Wednesday, May 6, 2020

                                                                      सरहदें



मैं  अभी तक खुद को मुतमईन नहीं कर पाया कि ये दुनियां-जहाँ  किसने बनाया है| अभी तक के ज्ञान, खोज व जांच पड़ताल के अनुसार कई  विचारधाराएँ  हैं, दुनियाँ के बनने और बनाने के बारे मैं, लेकिन कोई भी पूरे तरीके से इस सवाल का जवाब नहीं ढूड पाया, हाँ मगर कुछ का कहना है कि ये पूरा जहाँ कुछ दिन में  बना, कुछ कहते हैं के इस के बनने मैं हफ्ते लगे| एक सोच ये है के इस के बनने में  लाख़ों साल का वक़्त लगा और आज  भी वो प्रक्रिया चल रही है| पूरे जहाँ का अंदाज़ा लगाना भी शायद अभी काफी मुश्किल से मुमकिन हो पाया है तो इस के बनने या बनाने वाले का पता लगाना इतना आसान काम नहीं है| लेकिन कोशिश आये  दिन कुछ न कुछ नया  सामने ज़रूर लाती रहती है| बहुत लोग इस बात को रहस्य  कह कर या तो टाल देते हैं या किसी  बताई हुई बात से इस का हवाला दे कर सोचना छोड़ देते हैं|

मैं इस जहाँ को, इस पुरे निज़ाम  को कुदरत(प्रकृति) के नाम से जानना पसंद करता हूँ|  प्रकृति अपने आप में  ही सब कुछ है, ये आत्म निर्भर है, ये सब को बराबर नज़र से देखती है, इस की नज़र में  सब की अपनी-अपनी एहमियत है, चाहे पत्थर हो या पेड़, फल हो या टहनी, हवा हो या पानी सब की अपनी एक एहमियत है, अपनी-अपनी खूबसूरती है, सब घटक एक दुसरे की कमी या अधूरेपन को पूरा करते हैं, सब एक दुसरे से अलग हैं पर एक दुसरे के साथ चलते हैं, एक दुसरे के कम या ज़्यादा होने  से सब पर  असर पड़ता है| हवा जब चलती है तो अपने साथ बहुत कुछ उठा ले आती है कहीं से पराग्करण तो कहीं से बीज, कही से फूलों   की खुशबू उठा लेती  है और जो-जो रास्ते मैं आता है सब को बराबर बिना किसी भेदभाव के बांटी जाती है|  प्रकृति में  सब घटक एक दुसरे से मिल कर एक निज़ाम (तंत्र) बनाते हैं जहाँ सब का बराबर ख्याल रखा जाता है, सब अपने आप में  पूरे भी हैं और अधूरे भी, पानी जब बरसता है या बहता है तो वो सब के लिए मौजूद  होता है, उसी पानी में  छोटे-छोटे जीव अपना आशियाना बनाते हैं और उसी पानी को लेकर पौधे  ऑक्सीजन बनाते हैं, हरे-भरे जंगल लहराते हैं और जानवर उस से अपनी प्यास बुझाते  हैं, इस की एहमियत एक हाथी के लिए भी उतनी ही है जितनी कि चूहे  या किसी और क़द से छोटे जानवर के लिए| यहाँ जब सूरज अपनी किरणे  छोड़ता है तो वो बिना पहचान किये हुए सब पे बराबर पड़ती हैं सब उन से उर्जा प्राप्त करते हैं और उस उर्जा को अलग-अलग काम में  इस्तेमाल करते हैं| पत्ते  खाना बना लेते हैं, पानी भाप बन के उड़ जाता है, बहुत सारी रासायनिक, भौतिक  और जैविक  प्रक्रियाएं होती रहती हैं|

अगर देखा जाये तो हर एक जीव खुद अपने आप में  प्रकृति है, एक पौधा  सिर्फ एक तने या जड़ का नाम मात्र नहीं है, बल्कि  उसके सारे अंग मिल कर उस से एक पौधा  बनाते हैं जो खुद में  एक सिस्टम है, जिस में  सब के अपने-अपने काम हैं और सब बखूबी निभाते हैं, सब के काम की अपनी अपनी एहमियत है और हर एक के काम से दुसरे का काम प्रभावित होता है| पत्ते  जड़ पे निर्भर करते हैं, जड़ मिट्टी पानी और खाद पे निर्भर करती है| अब इसी सिस्टम को प्रकृति के अन्य घटकों  की भी ज़रूरत पड़ती है जैसे- हवा, पानी, रौशनी| तो बहुत सारी चीजें मिलकर एक तंत्र बनाती हैं| ऐसा ही हम अन्य जीवों  जैसे जानवरों  में  देखते हैं|
अभी तक यहाँ कोई भेद भाव, ऊँच-नीच, तेरा-मेरा, बेकार-कामगार, सही-गलत कुछ नहीं आया है, प्रकृति में  जितने स्रोत हैं वो सब के हैं और ज़रूरत के हसाब से सब उनका इस्तेमाल कर रहे हैं| फिर एक और जीव धरती पर आया जिसे हम इन्सान कहते हैं, उसके आने के बाद तक भी प्रकृति के निज़ाम  अपने तरीके से चलते रहे| तब कोई सरहद या लकीर नहीं थी, तब कोई बटवारा नहीं था, तब प्राकृतिक स्त्रोतों  पर चंद लोगों का क़ब्ज़ा नहीं था| अब तो सिर्फ ये तस्सवुर  ही किया जा सकता है|

इन्सान के आने के बाद और  धरती के अलग-अलग कोनों में  पहुँचने के बाद यहाँ की तस्वीर बदलने लगी| इस प्रजाति की आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी, इसके कारण अस्थानीय स्त्रोतों  पर भारी दबाव पड़ने लगा और इस कारण उस ने एक जगह  से दूसरी  जगह  जाना  शरू किया, इसी प्रक्रिया  के चलते ये पूरी दुनियाँ में  पहुँच गया, सोचने लगा, विचार करने की क्षमता पैदा कर ली, स्रोतों  पे क़ब्ज़ा करने लगा, और लड़ाई करने लगा| ज़रूरत ने उससे दूसरे जानवरों  का और पौधों  का खुद के लिए इस्तेमाल करना सिखा  दिया| दुश्मन और दोस्त बनाने लगा, ताक़त हासिल करने लगा और खुद को औरों  पर भरी साबित करने लगा| तब उस ने प्रकृति को अपनी जायदाद समझना शरू कर दिया| अब प्रकृति के अपने निज़ाम  में  तब्दीली आने लगी| कभी कहीं बाढ़  और कहीं सूखा आने लगा|

वक़्त गुज़रता गया और इन्सान अपने हाथ पाओं बढ़ता गया, दिमाग में  सोचने की क्षमता और बढ़  गयी, अब उस ने अन्य जीवों  को अपने अलग-अलग इस्तमाल में  लाना शरू कर दिया, और इतने से शरीर वाला इन्सान दुनियाँ का मालिक बन बैठा| उसे ने पूरी पृथ्वी पे लकीरें खींच कर, दीवारें बना कर इस को बाँट दिया, जो पृथ्वी कभी  सब की हुआ करती थी और सब उस के हुआ करते थे, अब वो लाकीरों  में  बंट कर मेरी और तेरी रह गयी| फिर जैसे-जैसे इन्सान ने तरक्की  की वैसे-वैसे और भी बदलाव आने लगे| धर्म  बन गये, अलग-अलग विचार धाराएँ जन्मी, अलग-अलग गुट बन गए|  सारी दुनियाँ को मुलाकों में  बाँट दिया| लाकीरों  के हिसाब से लोग भी बँट गए|

उंच-नीच, बुरे-अच्छे , हमारे लोग तुम्हारे लोग, हमारी बिरादरी उनकी बिरादरी, हमारा धर्म  उनका धर्म ऐसे कई  सारे अंतर पैदा हो गये| ज़मीन के टुकडों पर  लड़  कर एक दुसरे की जान लेना, अपने ही जैसे इन्सान को दुश्मन कहना उससे नफ़रत करना बहादुरी माना जाने लगा| इन्सान ने अलग अलग निशाँ बना लिए, लिबास चुन लिए, धर्म चुन लिए, अपनी-अपनी पहचान बना ली, कुछ न कुछ ऐसा किया जिससे एक समूह दुसरे से अलग लगे| काम का बटवारा कर लिया और एहमियत भी तय कर ली किसी काम को महान और किसी  को नीच कहा जाने लगा, उसी  तरीके से महान काम करने वाले महान कहलाये और नीच काम करने वाले को नीच और दरिद्र कहा जाने लगा| ज़मीन पे कुछ लोगों का क़ब्ज़ा हो गया और बहुत लोग इस से वंचित रह गए| आगे चल कर  इन्सान ने इसी तर्ज़ पर बस्तियां बसाई| काम के हिसाब से, बिरादरी या धर्म  के हिसाब से, अमीर और गरीब के हिसाब से समाज कई  सारी परतों में  बाँट दिया गया| इन्सान तरक्की  तो करता गया लेकिन एक गलती साथ लिए चला  जब भी उसके मन में  कुछ सवाल उठे उस ने खुद उत्तर  खोजने  के बजाये किसी और से उसके उत्तर  पूछे, और बेवकूफ बनता गया| बहुत सी संस्थाएं बन गयी जो समस्या निर्माण भी  करने लगी और समाधान भी देने लगी इस प्रथा ने भक्ति को जन्म  दिया और सिखाया कि सवाल उठाना मना है , तुम सिर्फ सुन सकते हो,  सवाल नहीं उठा सकते |

नतीजा ये हुआ के उस ने हर जगह सरहदें बना लीं, लकीरें खींच दीं, सब कुछ बाँट दिया, पहचानें बना ली और फिर उन पहचानों को बचाए रखने की खातिर दूसरों से लड़ने लगा| खुद को अपने से अलग विचार वाले से असुरक्षित महसूस करने लगा| अब ये दीवारें सिर्फ ज़मीन के टुकडों पर नहीं बल्कि  उसके दिमाग में  खिच गयीं| उस के दिमाग में  अलग तस्वीरें छप गयी और वो दुनियाँ को उसी नज़रिए  से देखने लगा| उस ने हर उस चीज़ का फ़ायदा उठाना शरू किया जिससे उसको सत्ता और सम्पति मिले|  अब देखते-देखते प्रकृति की तस्वीर बहुत बदल गयी|

आज हर कोई छाती पीट-पीट कर, डंका  बजा-बजा कर ये कहता मिलता है कि मेरा धर्म  तेरा धर्म , मेरा देश तेरा देश, मेरी मस्जिद मेरा मंदिर, मेरा  गिरजा घर, आज हर कोई दुसरे का पल में  दुश्मन बन जाता है, जो कल तक तुम्हारे साथ हँसता खेलता था, साथ खाता था वो आज पराया और दुश्मन बन जाता है| इस पार से देखो तो उस तरफ खड़ा इन्सान दुश्मन लगता है लेकिन उस तरफ से जा कर देखो इस पार खड़ा इन्सान भी दुश्मन लगता है गोया कोई किसी के लिए मित्र है और वही किसी के लिए दुश्मन है बस नज़र- नज़र का फ़र्क है| ऊपर  से देखो तो दोनों -दुश्मन भी और सज्जन भी बेवकूफ लगते हैं| इन्सान ऐसा कैसे हो गया? ये सवाल अक्सर चोट करता है लेकिन ये इन्सान पल भर में  ऐसा नहीं हो गया इस को ऐसा होने में  बहुत वक़्त लगा है| ये ऐसा इसलिया हुआ क्यूंकि इस ने अपने सवालों  के उतर किसी  और से मांगे, अपना रहबर किसी और को बनाया, कभी कोई सवाल ही नहीं पूछा पलट कर, तर्क  करना छोड़ दिया तो नतीजतन आज इन्सान ऐसा हो गया कि कोई कुछ भी कह जाये उस से मान  लेने को तैयार हो जाता है| वो जन्म  से लेकर मौत तक और उसके बाद भी बहुत सारी जंजीरों  में  बंधा है|  जिन्हें वो तोड़ना ही नहीं चाहता और चाहे भी तो  समाज तोड़ने नहीं देता बल्कि  और बांध देता है|

आज ऑफिस से निकलते ही किसी का इंतज़ार करना पड़ा| मेरी आदत है और अब शौक  भी बन गया है जब भी मौक़ा मिले बच्चों  के साथ खूब बात करना, चाहे वो कोई भी हो, कहीं का भी हो, क्यूंकि  मै मानता हूँ कि बच्चे कम से कम कुछ हद तक साफ़ होते हैं ऐसे ही जैसे ग्लोब पर  कोई लकीर न खिंची हो| बच्चे  क्रिकेट खेल रहे थे, ठीक मंदिर के सामने, खेलते खेलते अचानक गेंद मंदिर के अन्दर चली गयी| ये कोई नयी बात नहीं थी ऐसा पहले भी कई  बार हो चुका था लेकिन आज किस्सा कुछ अलग सा था, दोनों  मुझे अन्दर जा कर गेंद लाने को कहने लगे, पर मैंने  मना कर दिया और उन से पुछा के आप क्यों नहीं जा रहे| उन्होंने बोला  कि हम नहीं जा सकते क्यूंकि  मंदिर हमारा नहीं है, हम अन्दर नहीं जा सकते मम्मी ने मना किया है| मेरे और पूछने पर उन्होंने  बताया कि वो अलग बिरादरी के हैं इसलिए मंदिर में नहीं जा सकते | हमारी बिरादरी वालों  की मस्जिद होती है| जब मैंने  और तफसील से पुछा तो बोले मंदिर भगवान का होता और भगवान हमारा नहीं है  हमारा तो अल्लाह है| हमें अल्लाह ने बनाया है और इन लोगों को भगवान ने बनाया है| खैर, थोड़ी देर बहस करने के बाद एक ने हिम्मत की और जा कर गेंद ले आया लेकिन एक वादे पर कि  कोई घर नहीं बतायेगा| अब इत्तेफ़ाक से पूरी गली के बच्चे  आजतक ये पता नहीं लगा पाए के मेरा धर्म  क्या है| जब भी उन्होंने  पूछा मैंने  चार सवाल और पूछ लिए| उस की एक बात मुझे और अजीब लगी के वो रोज़ा की हालत में  अगर मंदिर के अन्दर जायेगा तो उसका रोजा टूट जायेगा| अब ये बात उसको जिस ने बताई हो मगर एक बात साफ़ है के सरहदें बननी शरू हो गयी हैं, और कल आते-आते दीवारें बन जाएँगी|

अब मेरी  ये बात बहुत लोगों के लिए एक आम सी बात हो सकती है और ये भी मुमकिन है कि बहुत लोग इस से कोई ख़ास बात न समझें लेकिन मेरे लिए काफी एहमियत रखती है क्यूंकि  ऐसी ही बातें  और बच्चों  से सुन चूका हूँ जिन की नज़र में  मस्जिद और मस्जिद में  जाने वाले लोगों के बारे में  कुछ ऐसी ही राये है| असल में  बात वाही है कि दोनों नदी के आर पार खड़े हैं  दोनों एक दुसरे को गलत समझते हैं| लेकिन बीच की सचाई से दोनों दूर हैं और शायद ही कभी रूबरू हो पायें| आज की दुनियाँ शायद यही है बहुत तो ये भी सुझाव देते हैं के अगर रहना है तो ऐसा ही होना पड़ेगा| अब सवाल ये के आप क्या चाहते हैं नदी का किनारा या नदी की गहराई|

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2 comments:

  1. वाह!बहुत खूब ।हक़िकत है ये समाज की जो चली आ रही है और चलती ही जा रही है.....पर लहू का रंग एक है....।

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