हमारा रोना और कुकर की सिटी
ऐसा लगता है जैसे इंसान का रोना-कुकर की सिटी की तरह होता
है, इंसान के दिमाग में भी विचार चलते रहते हैं मुसलसल, फ़िर हलचल मचती है, तोफान
उठता है और फ़िर इंसान रो देता है, बे-इन्तहा रोता है, कभी आवाज़ के बिना और कभी
आवाज़ के संग, ठीक वैसे ही जैसे कुकर के नीचे आग जलती रहती है, और सिटी बज जाती है,
ऐसे बजती है जैसे तोफान उठ गया हो और देखते ही देखते वो शांत हो जाता है जैसे कुछ
हुआ ही न था| इंसान भी अक्सर बहुत रोने के बाद चुप हो जाता है, सुन हो जाता है,
नज़रें थम सी जाती हैं, दिल की धड़कन साफ़ सुनाई देने लागति है, अन्दर की हलचल अब
तालाब के पानी की तरह थमने लगती है, आँखों में आंसू पर जब हवा लगती है तो ठंडक का
एक एहसास होता है| इंसान हल्का हल्का महसूस करने लगता है जैसे किसी भोज को उतार
आया हो, कोई क़र्ज़ चूका आया हो| रोना हर वक़्त गलत नही होता और रोने से आदमी कमज़ोर
भी नही होता, मन करे तो जी भर के ईमानदारी से रो लेना चाहिए और कुछ हो न हो आँखों
की सफाई तो हो ही जाती है|
मगर हर वक़्त रोना गलत बात है, हर वक़्त रोते रोते इंसान खुद
को ख़तम कर देता है और उससे एहसास ही नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे कुकर से अगर हवा
निकलती रहे तो अन्दर रखा खाना जल जाता और पता तक नहीं चलता|
*******************
No comments:
Post a Comment